
- शरद मिश्रा
बांदा। ‘विकास की पहली पहचान सड़क’ होती है, लेकिन बांदा के ग्रामीण इलाकों में ‘यही सड़कें’ अब लोगों के लिए ‘सबसे बड़ी मुसीबत’ बन गई हैं। करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गईं ‘सैकड़ों सड़कें आज गड्ढों में तब्दील’ हो चुकी हैं। हालत यह है कि ‘सड़कें अब विकास की नहीं, बल्कि बदहाल व्यवस्था की कहानी बयां’ कर रही हैं। जगह-जगह बने ‘गहरे गड्ढे राहगीरों की जान जोखिम में डाल’ रहे हैं, जबकि जिम्मेदार विभाग की ओर से मरम्मत की रफ्तार बेहद धीमी बताई जा रही है।
सदर, नरैनी, बबेरू और अतर्रा तहसीलों के गांवों को जोड़ने वाली करीब 500 सड़कें बदहाल स्थिति में हैं। कहीं डामर उखड़ चुका है, कहीं सड़कें गड्ढों में बदल गई हैं और कहीं बरसात का पानी भरने से रास्ता पहचानना मुश्किल हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़कें मानो ‘मरम्मत का मरहम’ मांग रही हैं। बरसात शुरू होते ही इन सड़कों की वास्तविक स्थिति सामने आ गई है। सड़कें जगह-जगह टूट चुकी हैं और गड्ढों में पानी भर जाने से वाहन चालकों को गहराई का अंदाजा तक नहीं लग पाता। दोपहिया वाहन चालक सबसे ज्यादा खतरे में हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि ‘कई सड़कों के निर्माण में गुणवत्ता का पर्याप्त ध्यान नहीं’ रखा गया। उनका कहना है कि सड़कें बनने के ‘कुछ समय बाद ही उखड़ने’ लगीं और अब हालात यह हैं कि ‘जगह-जगह बड़े गड्ढे’ बन गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि ‘भारी और ओवरलोड वाहनों के लगातार संचालन’ से भी कई ‘सड़कें तेजी से क्षतिग्रस्त’ हुई हैं। उनका मानना है कि यदि समय पर ‘मरम्मत और निगरानी’ होती तो ‘स्थिति इतनी खराब नहीं’ होती। सरकार ग्रामीण संपर्क मार्गों को विकास की रीढ़ बताती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई ‘गांवों में सड़कें खुद विकास के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा’ बन गई हैं।
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