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बांदा में वैज्ञानिक हैरान, इतिहासकार भी उलझे: आखिर क्या है रहस्य ?
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बांदा में वैज्ञानिक हैरान, इतिहासकार भी उलझे: आखिर क्या है रहस्य ?

शरद मिश्रा सम्पादक सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश

  • शरद मिश्रा

बांदा। बुंदेलखंड जहां एक बूंद पानी के लिए लोग तरसते हैं, वहीं “विंध्याचल की चोटियों पर बसा कालिंजर दुर्ग एक ऐसा चमत्कार समेटे” है जिसने सदियों से “वैज्ञानिकों और इतिहासकारों को उलझा” रखा है। यहां “नीलकंठेश्वर मंदिर में स्थापित शिवलिंग के गले से अविरल जलधारा” बहती है। सबसे हैरान करने वाली बात “कितना भी भयंकर सूखा पड़ जाए, ये धारा एक पल के लिए भी नहीं” रुकती।

ऐतिहासिक 'कालिंजर व मंगलगढ़' किले बनेंगे 'टूरिज्म हब': 160 करोड़ होंगे खर्चस्थानीय मान्यता और पुराणों के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया था। उसी “विष के प्रभाव को शांत करने के लिए ये जलधारा” आज भी उनके “कंठ” से निकलती है। मंदिर के पुजारी बताते हैं,“यह कोई साधारण पानी नहीं है। शिव के नीलकंठ होने का प्रमाण” है। 100 फीट की ऊंचाई से “गिरती ये धारा दुर्ग की तलहटी में बहने वाली पातालगंगा” में मिल जाती है। “पातालगंगा भी कभी नहीं सूखती”

बांदा में अद्भुत शिव भगवान की मूर्ति : गले से फूटी जलधाराकालिंजर दुर्ग में बेला तालाब, सुरसरि गंगा और पातालगंगा, तीनों बारहमासी जलस्रोत हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ के अंदर चूना पत्थर और प्राकृतिक जलधारा का नेटवर्क होगा। लेकिन सैकड़ों फुट ऊंचे शिवलिंग के गले से ठीक इसी बिंदु से पानी का निकलना, वो भी बिना रुके, इसे एक “अबूझ पहेली” बना देता है। जिला प्रशासन के रिकॉर्ड के अनुसार पिछले 50 साल में बुंदेलखंड में 15 बार भीषण सूखा पड़ा, लेकिन “नीलकंठेश्वर से एक दिन भी जलधारा बंद नहीं” हुई।

कालिंजर बनेगा 'अंतरराष्ट्रीय पर्यटन हब':16 करोड़ से 'इतिहास' को मिलेगा 'आधुनिक जामा'मंदिर के ठीक पीछे “पहाड़ काटकर एक विशाल कुंड” बनाया गया है। पुरातत्वविदों का मानना है कि ये सिर्फ “जल संचयन” के लिए नहीं था। “बुंदेला काल” के दस्तावेजों में इस “कुंड और किले के गुप्त खजाने” का “जिक्र” मिलता है। मान्यता है कि “खजाने का रहस्य” इसी “जलधारा की दिशा में छिपा” है, लेकिन आज तक कोई इसका “सुराग” नहीं लगा सका।

बांदा में अद्भुत शिव भगवान की मूर्ति : गले से फूटी जलधाराहर सोमवार और सावन में हजारों श्रद्धालु इस जल को “अमृत” मानकर ग्रहण करते हैं। “मान्यता” है कि इस जल से स्नान करने और शिवलिंग का अभिषेक करने से “रोग-दोष दूर” होते हैं। प्रकृति, विज्ञान और आस्था के संगम वाले कालिंजर का यह शिवलिंग बुंदेलखंड के लिए सिर्फ “धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि जल संरक्षण” का भी “जीवंत उदाहरण” है। जब पूरा क्षेत्र “सूखे से जूझ रहा हो, तब ये अविरल धारा लोगों को उम्मीद” देती है।

 
 



Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh
 





 

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