
- विनोद मिश्रा
बांदा। विधानसभा चुनाव 2027 नजदीक आते जा रहे हैं, लेकिन जिले में ‘भाजपा संगठन की जमीनी हकीकत’ को लेकर पार्टी के ‘भीतर असंतोष खुलकर सामने’ आने लगा है ? कई पुराने और जमीनी कार्यकर्ताओं ने कथित रूप से संगठन की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि ‘संगठन’ अब ‘जनता के मुद्दों और बूथ की मजबूती’ की बजाय “ठेकेदारी, सेटिंग और कमाई” का अड्डा बन गया है?
पार्टी सूत्रों के अनुसार जिले की ‘चार विधानसभा सीटों’ में ‘समीकरण’ पूरी तरह ‘अलग-अलग’ हैं। सदर में विधायक प्रकाश द्विवेदी और तिंदवारी में विधायक एवं जलशक्ति राज्य मंत्री रामकेश निषाद अपने ‘विश्वसनीय कार्यकर्ताओं’ और ‘बूथ स्तर की सक्रिय टीम’ के ‘दम पर पार्टी को संभाले’ हुए हैं।
दोनों क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं के ‘साथ-साथ’ संगठनात्मक कार्यक्रम भी इन्हीं के ‘प्रयासों से आगे बढ़’ रहे हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन ‘दोनों सीटों’ पर अभी भी ‘पार्टी का बूथ ढांचा’ मजबूत दिखाई दे रहा है।
लेकिन इसके ‘उलट’ बबेरू और नरैनी विधानसभा क्षेत्रों की स्थिति ‘कथित रूप’ से ‘बेहद कमजोर’ बताई जा रही है। आरोप है कि वहां मंडल अध्यक्ष से लेकर बूथ अध्यक्ष तक के बीच कोई समन्वय नहीं है। बबेरू की स्थिति पर जमीनी तैयारी शून्य के आरोपों में है ! नरैनी में भी ‘संगठनात्मक बैठकों में कार्यकर्ताओं’ की ‘उपस्थिति कम’ हो रही है और ‘पुराने कार्यकर्ता हाशिए’ पर चले गए हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा ‘जिला संगठन के कामकाज’ को लेकर है। ‘पार्टी से जुड़े लोगों’ का कहना है कि जिला संगठन में उपाध्यक्ष राजभवन, महामंत्री निखिल सक्सेना, ममता मिश्रा और अमित सेठ जैसे पदाधिकारी ‘अपनी व्यक्तिगत मेहनत और लगन से संगठन’ को चलाने का ‘प्रयास’ कर रहे हैं। इन्हीं 4 लोगों के ‘भरोसे आज भी जिला स्तर’ के कई ‘कार्यक्रम और बूथ संपर्क अभियान’ चल रहे हैं। अगर यह लोग नहीं होते तो ‘संगठन की हालत और खराब’ होती। मीडिया प्रभारी उत्तम सक्सेना को इतना ‘कमजोर’ कर दिया गया हैं की वह ‘मीडिया को कैसे समेटें इसी टेंशन’ में रहते हैं।
संगठनात्मक पदों का इस्तेमाल व्यक्तिगत हितों और “ठेकेदारी” के लिए किया जा रहा है ! ‘पार्टी के अंदर’ यह ‘कहावत’ भी आम हो गई है “बोआ पेड़ बबूल का आम कहाँ से होय”। राजनीतिक जानकारों का मानना है की अगर ऐसा ही चलता रहा तो 2027 में इसका सीधा असर वोट प्रतिशत पर पड़ेगा। सरकार की ‘योजनाएं और विधायकों की मेहनत’ एक तरफ है, लेकिन ‘संगठनात्मक कमजोरी’ दूसरी तरफ ‘भारी पड़’ सकती है!
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