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October 11, 2026
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बुंदेलखंड की मिट्टी बोली तो हिल गया 'बॉलीवुड': महंगाई डायन ने दुनिया को दिखाया लोकगीत का दम
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बुंदेलखंड की मिट्टी बोली तो ‘हिल’ गया ‘बॉलीवुड’: महंगाई डायन ने ‘दुनिया’ को दिखाया लोकगीत का दम

विनोद मिश्रा डायरेक्टर सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश

  • विनोद मिश्रा

बांदा। आल्हा-ऊदल की वीरगाथाओं और महाराजा छत्रसाल के शौर्य के लिए मशहूर बुंदेलखंड ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यह धरती सिर्फ तलवार नहीं चलाती, कलम और सुरों से भी क्रांति करती है। इस मिट्टी से निकला एक लोकगीत ‘महंगाई डायन खाए जात है’ आज गरीब की थाली से लेकर संसद तक का सबसे तीखा सवाल बन चुका है।

बुंदेलखंड की मिट्टी बोली तो हिल गया 'बॉलीवुड': महंगाई डायन ने दुनिया को दिखाया लोकगीत का दमपानी की कमी, पलायन और गरीबी से जूझते बुंदेलखंड की पहचान सिर्फ सूखे खेत नहीं हैं। यह वो जमीन है जहां “हर दुख की एक धुन है,हर आंसू का एक राग” है। मध्य प्रदेश के “छोटे से गांव बड़वाई” में जन्मा ‘महंगाई डायन’ गीत इसी का सबूत है। गांव के लोकगायक “गयाप्रसाद प्रजापति” ने जब देखा कि टमाटर 100 पार और आटा-दाल आम आदमी की पहुंच से बाहर है,तो उन्होंने महंगाई को आंकड़ों में नहीं, “आदमखोर डायन” बना दिया जो गरीब की कमाई निगल जाती है।

बुंदेलखंड की मिट्टी बोली तो हिल गया 'बॉलीवुड': महंगाई डायन ने दुनिया को दिखाया लोकगीत का दम‘बड़वाई विलेज मंडली’ जब ढोलक-हारमोनियम और मंजीरे के साथ चौपाल पर यह गीत गाती थी, तो वो सिर्फ मनोरंजन नहीं था। वो मजदूर की थकान, किसान का दर्द और गृहिणी की चिंता थी। 2010 में ‘पीपली लाइव’ ने जब इसी असली मंडली को रघुबीर यादव के साथ पर्दे पर उतारा, तो बुंदेलखंड का ये ‘लोक-व्यंग्य’ सीधे दिल्ली के गलियारों तक पहुंच गया। न स्टूडियो की चमक,न ऑटो-ट्यून मिट्टी की सौंधी महक ने बॉलीवुड को बता दिया कि असली भारत कहां बसता है। इस गीत की ताकत है बुंदेलखंड का ठेठ अंदाज। यहां “महंगाई पर रोया नहीं जाता, उसे डायन बताकर लताड़ा” जाता है। “नून तेल लकड़ी, सब महंगा है, हाय महंगाई डायन खाए जात” है। यह “पंक्तियां सुनकर मनोरंजन भी होता हैऔर कलेजा भी छलनी”। यह वही बुंदेलखंडी तेवर है जो कभी अंग्रेजों से लड़ता था,आज महंगाई से लड़ रहा है।

बुंदेलखंड की मिट्टी बोली तो हिल गया 'बॉलीवुड': महंगाई डायन ने दुनिया को दिखाया लोकगीत का दमबुंदेलखंड ने हमेशा सत्ता से सवाल किए हैं। ‘महंगाई डायन’ भी उसी परंपरा की कड़ी है। ये श्रम गीत है, लोक-व्यंग्य है और सरकारों के लिए आईना भी। जब-जब प्याज रुलाता है, जब-जब पेट्रोल जलाता है, बुंदेलखंड की ये धुन सोशल मीडिया से लेकर धरनों तक गूंजने लगती है। यहां के गीत एसी स्टूडियो में नहीं, खेत की मेड़ और चौपाल पर जन्मते हैं। ठेठ बुंदेली में कही बात सीधे दिल में उतरती है। यहां का लोक रोता नहीं, व्यंग्य से वार करता है। आज जब देश डिजिटल हो रहा है,बुंदेलखंड का यह गीत याद दिलाता है कि भारत की आत्मा आज भी गांवों में बसती है। ‘महंगाई डायन’ ने बता दिया कि वीरों की इस भूमि के सुरों में वो ताकत है जो संसद से सिनेमा हॉल तक को हिला दे। बुंदेलखंड सिर्फ एक इलाका नहीं, एक जज्बा है,जहां फाके भी गीत बनकर अमर हो जाते हैं।

 
 



Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh
 





 

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