
- विनोद मिश्रा
बांदा। ‘बीस साल और पुल’ के नाम पर ‘सिर्फ लकड़ियां’ ! हर दिन ‘खतरे’ का सफर ‘बार-बार गुहार’ और अब ‘चुनाव बहिष्कार’ की ‘चेतावनी’। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि बांदा जिले की ग्राम पंचायत ‘अतरहट की जमीनी हकीकत’ है।
जहां आज भी ग्रामीण एक स्थायी पुलिया का ‘इंतजार’ करते-करते ‘थक’ चुके हैं और ‘जान जोखिम’ में डालकर ‘लकड़ी के अस्थायी पुल’ से ‘आवागमन करने को मजबूर’ हैं। विकास के दावों के बीच ‘अतरहट की यह तस्वीर सिस्टम से सीधा सवाल’ कर रही है ‘आखिर ग्रामीणों को पक्की राह कब’ मिलेगी?
ग्राम पंचायत अतरहट के ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले करीब 20 वर्षों से लकड़ी के ‘अस्थायी पुल’ के ‘सहारे आवाजाही’ हो रही है। बारिश के दिनों में ‘हालात और ज्यादा खतरनाक’ हो जाते हैं। लकड़ियों से बने इस ‘अस्थायी रास्ते से गुजरना’ हर दिन किसी ‘खतरे से खाली’ नहीं है, लेकिन ‘मजबूरी’ ऐसी है कि ‘ग्रामीणों के पास दूसरा रास्ता भी नहीं’।
बच्चे हों, बुजुर्ग हों या महिलाएं ‘जरूरत’ पड़ने पर इसी ‘अस्थायी पुल का सहारा’ लेना पड़ता है। ‘सवाल’ यह है कि जिस रास्ते पर हर दिन ‘जिंदगी दांव’ पर लग रही हो, वहां ‘पक्की पुलिया दो दशक से क्यों नहीं बन’ पाई ? ग्रामीणों का कहना है कि पुलिया निर्माण को लेकर कई बार संबंधित ‘अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से गुहार’ लगाई, लेकिन आज तक समस्या ‘जस की तस’ है। गांव के लोगों ने समस्या का स्थायी ‘समाधान’ नहीं होने पर ‘चुनाव बहिष्कार की चेतावनी’ दी है।
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