
- शरद मिश्रा
बांदा। एक ओर सरकार ‘स्वच्छ भारत मिशन’ को ‘गांव-गांव’ तक पहुंचाने और ‘खुले में शौच मुक्त’ भारत का ‘दावा’ कर रही है, वहीं दूसरी ओर बांदा के जसपुरा ब्लॉक में सरकारी धन से बना सार्वजनिक शौचालय अपनी बदहाली की कहानी खुद बयां कर रहा है। लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद यह शौचालय आज तक आम लोगों के किसी काम नहीं आ सका। ब्लॉक मुख्यालय के ठीक सामने खड़ा यह ‘ढांचा विकास की तस्वीर नहीं, बल्कि सरकारी लापरवाही’ और ‘सवालों का प्रतीक’ बन गया है।
ब्लॉक परिसर में रोजाना दर्जनों गांवों से लोग विभिन्न सरकारी कार्यों के लिए पहुंचते हैं, लेकिन सबसे बुनियादी सुविधा सार्वजनिक शौचालय उनके लिए बंद पड़ी है। सबसे अधिक परेशानी महिलाओं, बुजुर्गों और दिव्यांगों को उठानी पड़ रही है। स्थानीय निवासी दयाराम का आरोप है कि जसपुरा विकासखंड के अंतर्गत लगभग 42 गांव आते हैं। प्रतिदिन सैकड़ों लोग ब्लॉक मुख्यालय पहुंचते हैं, लेकिन सार्वजनिक शौचालय वर्षों से उपयोग के लायक नहीं है।
उनका कहना है कि विकास कार्यों के नाम पर केवल औपचारिकताएं पूरी की गईं, जबकि जमीनी स्तर पर सुविधाएं लोगों तक नहीं पहुंच सकीं। आरोप है कि शौचालय के निर्माण में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं। उनके अनुसार, नियमानुसार शौचालय के नीचे भूमिगत सेप्टिक टैंक और मानक के अनुरूप संरचना बनाई जानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। उनका दावा है कि केवल ‘ढांचा’ खड़ा कर निर्माण पूरा दिखा दिया गया, जिससे ‘सरकारी धन का दुरुपयोग’ हुआ।
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