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बुंदेलखंड की 'लोकपरंपराएं' हुई विलुप्त: सावन के गीत खामोश, झूले की डाली अब 'बंजर'
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बुंदेलखंड की ‘लोकपरंपराएं’ हुई विलुप्त: सावन के गीत खामोश, झूले की डाली अब ‘बंजर’

Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh

  • शरद मिश्रा

बांदा। “झूला तो पड़ गयो अमवा की डार मा” ये गीत कभी सावन की पहचान हुआ करता था। ढोल-मंजीरे की थाप और मोरों की आवाज के बीच बुंदेली महिलाएं जब समूहों में बगीचों की डालियों पर झूले डालती थीं, तो सावन सच में धरती पर उतर आता था। लेकिन अब यह परंपरा दम तोड़ रही है। ‘न झूले हैं, न बगीचे और न ही गीत’ रह गया है तो बस एक पीढ़ी की यादों में खोया हुआ ‘सावन’

बुंदेलखंड में अब नहीं दिखाई देते "सावन में झूले" : सावन के "गीत" भी हो गये "विलुप्त"

बुंदेलखंड सिर्फ सूखे और पलायन का ही पर्याय नहीं, यह अतीत में समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं का गढ़ रहा है। तीज-त्योहारों के उत्सव, मेलों की रौनक, बेटियों की विदाई और वापसी के भावुक क्षण इन सबका साक्षी सावन हुआ करता था। पर आज हालात बदले हैं। अब आम के वो हरे-भरे बागान या तो उजड़ चुके हैं या रीयल एस्टेट की भेंट चढ़ चुके हैं। नतीजा, न तो झूले हैं और न ही बेटियों की ‘पेंग’ भरती हँसी।

बुंदेलखंड में अब नहीं दिखाई देते "सावन में झूले" : सावन के "गीत" भी हो गये "विलुप्त"

बांदा के बड़ोखर गांव की बुजुर्ग महिला सुनीता देवी उदास स्वर में कहती हैं, “पहले हमारे गांव के चारों ओर बगीचे ही बगीचे थे। सावन आते ही झूले पड़ते थे, बहुएं-बेटियां गाती थीं। अब बगीचे नहीं बचे, बेटियों की हँसी भी कहीं खो गई।” पहले सावन सिर्फ मौसम नहीं होता था,यह सामाजिक समरसता और नारी सम्मान का पर्व होता था। बेटियों की वापसी, बहनों की चूड़ियों की खनक और खेतों में मोरों की आवाज़ें सब मिलकर एक भावनात्मक लोकगीत रचती थीं। आज समाज में बढ़ती छेड़छाड़, घटती संवेदनाएं और टूटते आपसी रिश्ते इस समरसता को ‘निगल’ रहे हैं।

बुंदेलखंड में अब नहीं दिखाई देते "सावन में झूले" : सावन के "गीत" भी हो गये "विलुप्त"

सावन में मोरों का नृत्य और उनकी आवाज, जो कभी ढोल-मंजीरे के साथ सुर मिलाती थी, अब सन्नाटे में गुम हो गई है। बगीचे उजड़ने से राष्ट्रीय पक्षी मोर भी अब बिरले ही दिखते हैं। पर्यावरणीय असंतुलन ने जहां हरियाली छीनी है, वहीं भावनात्मक और सांस्कृतिक संपन्नता को भी बंजर कर दिया है। 70 वर्षीय महिला कहती है कि पहले सावन में गांव गूंजता था, अब बस मोबाइल गूंजते हैं। बच्चों को इन गीतों की कोई समझ ही नहीं बची।” छात्रा पूजा वर्मा कहती है हमने झूला कभी आम की डाल पर नहीं झूला, नानी की कहानियों से ही जाना। अब बस इंस्टाग्राम पर ही ‘सावन’ मिलता है।

 

 

 

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