
- विनोद मिश्रा
बांदा। वीरों की धरती कही जाने वाली बुंदेलखंड की ‘वीर भूमि कैंसर से पीड़ित’ हो गई है ! अब वह ‘लास्ट स्टेज’ पर है। अगर समय रहते इलाज नहीं हुआ तो यह ‘धरती पूरी तरह बांझ’ हो जाएगी। मिट्टी की यह बीमारी बेतहाशा रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल से हुई है। जिले के 2.88 लाख किसान दो लाख हेक्टेयर में बिना ‘मृदा परीक्षण’ के अधिक पैदावार के ‘लालच’ में ‘खाद का अंधाधुंध प्रयोग’ कर रहे हैं।
मृदा परीक्षण केंद्र द्वारा सदर, पैलानी, बबेरू, अतर्रा और नरैनी तहसील में की गई जांच में मिट्टी में जैविक कार्बन प्रति एकड़ मात्र 0.45 प्रतिशत पाया गया, जबकि इसका 0.75 प्रतिशत से अधिक होना अनिवार्य है। बीते साल ही यह 0.60 प्रतिशत था, जो एक साल में ‘तेजी से घटा’ है। इसी तरह पोटैशियम का स्तर पहले 140 किलोग्राम था, जो अब घटकर 110 किलोग्राम रह गया है, जबकि आदर्श स्थिति 200 किलोग्राम की है।
मृदा परीक्षण केंद्र के अध्यक्ष रमाकांत यादव ने बताया कि जैविक कार्बन कम होने के साथ ‘मिट्टी’ में अम्लीयता व क्षारीयता, विद्युत चालकता, नाइट्रोजन, फास्फोरस, सल्फर, बोरान, जिंक, मैग्नीज, आयरन व कॉपर का ‘संतुलन भी लगातार बिगड़’ रहा है। उन्होंने बताया कि यही हाल चित्रकूट, हमीरपुर, महोबा व जालौन में भी है, जहां बेतहाशा उर्वरक के प्रयोग से मिट्टी की ‘गुणवत्ता खराब’ हो रही है।
पूरे ‘बुंदेलखंड में दस लाख से अधिक किसान इसी बीमार मिट्टी’ के बीच अपनी ‘फसलें’ तैयार कर रहे हैं। यादव ने ‘चेतावनी’ दी कि अगर ‘किसान बीमार मिट्टी में बिना परीक्षण’ के ऐसे ही ‘खाद डालते रहे तो खेती बंजर’ हो जाएगी और इसका ‘सबसे आसान व सस्ता’ इलाज ‘गोबर की खाद’ ही है।
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