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October 11, 2026
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चातुर्मासा में 'रो' रही 'बालू' पर 'टिकी' बांदा की 'पत्रकारिता': ज्ञान 'शून्य' पर नाम 'वरिष्ठ' !
उत्तर प्रदेशबुंदेलखंड

चातुर्मासा में ‘रो’ रही ‘बालू पर टिकी’ बांदा की ‘पत्रकारिता’: ज्ञान ‘शून्य’ पर नाम ‘वरिष्ठ’ !

विनोद मिश्रा डायरेक्टर सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश

  • विनोद मिश्रा

बांदा। बरसात के “चातुर्मास के साथ ही जिले में पत्रकारिता के नाम” पर “रोजी-रोटी” चलाने वालों का “रोना-धोना” शुरू हो गया है। क्योंकि “हकीकत” यह है कि इस “जिले की लगभग 90 प्रतिशत पत्रकारिता बालू पर टिकी” हुई है। जैसे ही मानसून शुरू हुआ औऱ “बालू खनन बंद” वैसे ही इन “पत्रकारों” की “दुकानें भी बंद” हो गईं।

चातुर्मासा में 'रो' रही 'बालू' पर 'टिकी' बांदा की 'पत्रकारिता': ज्ञान 'शून्य' पर नाम 'वरिष्ठ' !विचारणीय प्रश्न यह है कि “क्या इसे पत्रकारिता” कहा जा सकता है? जिले के “जानकार और पुराने पत्रकारों” का कहना है कि “यहां पत्रकारिता” के महत्व का “ककहरा” तक नहीं जानने वाले लोग भी “अपने को पत्रकार कहलवाने” में “गर्व महसूस” कर रहे हैं। जिन्हें अपने जिले की “सामाजिक, आर्थिक,  शैक्षणिक हालात और राजनीतिक समीकरणों” का “प्रारंभिक ज्ञान” तक नहीं है, वह “मंचों से और फोटो में अपने नाम” के आगे “वरिष्ठ पत्रकार” लिखवाकर “वाहवाही लूट” रहे हैं ! “पत्रकारिता कोई ठेका नहीं है जिसे बालू और विज्ञापन के दम” पर चलाया जाए।

चातुर्मासा में 'रो' रही 'बालू' पर 'टिकी' बांदा की 'पत्रकारिता': ज्ञान 'शून्य' पर नाम 'वरिष्ठ' !पत्रकारिता का पहला धर्म है “पढ़ना, समझना, सवाल करना और सच लिखना”। लेकिन “यहां पत्रकारिता के व्याकरण से पूरी तरह अनभिज्ञ लोगों की भरमार” है। उन्हें “खबर और विज्ञप्ति” में फर्क नहीं पता। उन्हें “तथ्य और अफवाह” में “अंतर” नहीं पता। लेकिन फिर भी “कैमरा और माइक” के साथ वह “खुद को चौथे स्तंभ” का “रखवाला” बताते हैं। दुर्भाग्य यह है कि “समाज भी अब इसी भ्रम का शिकार” हो चुका है। “फोटो खींचने वालों और सरकारी विज्ञप्ति” को इधर-उधर बांटने वालों को “पत्रकार और पत्रकारिता” समझने लगे हैं। “ज्ञानी और अज्ञानी” में फर्क खत्म हो गया है। “पढ़ने-लिखने” वाले और “सिर्फ दिखने” वाले में “फर्क मिट” गया है। इसी वजह से “असली पत्रकार भी आज भीड़ में अपनी पहचान खो” रहा है।

माफियाओं का तांडव: बालू का 'अवैध कारोबार और करोड़ों की लूट',प्रशासन क्यों बना मूक ?चातुर्मास ने “आईना” दिखा दिया है। जो लोग साल भर बालू, खनन, ठेके और विज्ञापन के सहारे अपनी “पत्रकारिता” चलाते थे, आज वह “बेरोजगार” हो गए हैं। क्योंकि उनकी “निष्ठा खबर में नहीं, कमाई” में थी। उनकी “कलम सवाल नहीं पूछती थी, सौदा करती” थी। अब वक्त आ गया है कि “समाज और प्रशासन यह तय करे कि उसे किस तरह की पत्रकारिता” चाहिए। फोटो और विज्ञप्ति वाली “नकली पत्रकारिता या सवाल और सच वाली असली पत्रकारिता”। क्योंकि जब तक “फर्जी और पेशेवर में लकीर नहीं खींची” जाएगी, तब तक बांदा में “पत्रकारिता इसी तरह बदनाम” होती रहेगी।

 
 



Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh
 





 

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