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बांदा में 'आधार कार्ड' बना 'जन-झंझट' की जंजीर: डाकघर में लाइनें लंबी, सिस्टम बेबस
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बांदा में ‘आधार कार्ड’ बना ‘जन-झंझट’ की जंजीर: डाकघर में लाइनें लंबी, सिस्टम बेबस

विनोद मिश्रा डायरेक्टर सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश

  • विनोद मिश्रा

बांदा। रामचरितमानस की पंक्ति “कलियुग केवल नाम अधारा” इन दिनों जिले में सच साबित हो रही है, लेकिन इस ‘नाम के आधार’ को पाने के लिए लोग जिस “जिल्लत और जद्दोजहद” से गुजर रहे हैं,  वह “प्रशासनिक संवेदनहीनता का आइना” बन चुकी है।

बांदा में 'आधार कार्ड' बना 'जन-झंझट' की जंजीर: डाकघर में लाइनें लंबी, सिस्टम बेबस आधार कार्ड, जो आज सरकारी योजनाओं, स्कूल दाखिले, छात्रवृत्ति, राशन से लेकर हर “जरूरी दस्तावेज की रीढ़” बन चुका है, उसकी प्राप्ति यहां अभिभावकों के लिए “किसी तपस्या से कम नहीं”। भीषण उमस गर्मी, लंबी कतारें, चक्कर पर चक्कर और ‘नतीजा’ “मायूसी का मंजर’

प्रधान डाकघर में नहीं बन रहे आधार कार्ड : जनता परेशान, अफसर उदासीनस्कूलों में दाखिले की प्रक्रिया शुरू है,लेकिन आधार कार्ड न होने से रजिस्ट्रेशन अटका हुआ है। प्रधान डाकघर में रोजाना जुटते हैं 200 से 300 अभिभावक जुटते हैं पर महज लगभग 30 का ही नंबर लग पाता है। जिले में 42 आधार केंद्र नामित हैं, पर ज़्यादातर केंद्र निष्क्रिय हैं। शिक्षा विभाग व आंगनबाड़ी केंद्रों को दी गई मशीनें भी “धूल फांक” रहीं और गांव-देहात से लोग “बच्चों को लेकर आते हैं, खाली हाथ लौटते” हैं।

बांदा में 'आधार कार्ड' बना 'जन-झंझट' की जंजीर: डाकघर में लाइनें लंबी, सिस्टम बेबस बंगालीपुरा स्थित प्रधान डाकघर में सुबह 6 बजे से ही माएं, पिता, बुजुर्ग और मासूम बच्चे लाइन में खड़े हो जाते हैं। बबेरू की रहने वाली सरोज देवी रोते हुए बताती हैं, “आठ दिन से आ रही हूं, नंबर ही नहीं आ” रहा। स्कूल वाले कह रहे हैं आधार लाओ, नहीं तो दाखिला नहीं होगा।” ये कोई एक आवाज़ नहीं, डाकघर परिसर में ऐसी सैकड़ों पीड़ाएं गूंज रही हैं जिन्हें “कोई सुनने वाला नहीं”

प्रधान डाकघर में नहीं बन रहे आधार कार्ड : जनता परेशान, अफसर उदासीनजिला प्रशासन ने भले ही दावा किया हो कि 42 नामित केंद्र आधार बनाएंगे, लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकांश बैंकों व सीएससी केंद्रों में आधार बनाने की सुविधा बंद है। आंगनबाड़ी और स्कूलों में लगी मशीनें शोपीस बन चुकी हैं। न वहां ऑपरेटर हैं और न ही जिम्मेदारी लेने वाला कोई। पहले डाकघर में दो काउंटर हुआ करते थे, जिससे हर दिन 100 से अधिक आधार बनते थे। लेकिन पिछले दो माह से सिर्फ एक काउंटर संचालित हो रहा है। अभिभावक सवाल कर रहे हैं कि “जब भीड़ बढ़ी है, तो काउंटर क्यों घटा” दिए गए ?

 
 



Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh
 





 

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