
- विनोद मिश्रा
बांदा। ‘संकल्प लिया, रक्षा करेंगे’ पर यह बांदा में ‘कसम हवा हवाई बनकर रह’ गई। गत वर्ष वन विभाग समेत 26 सरकारी विभागों ने 64 लाख पौधे रोपने का दंभ तो भरा, पर देखरेख के अभाव में आधे पौधे पहले मानसून में ही दम तोड़ गए। हकीकत यह है कि धरातल पर 50 फीसदी यानी 32 लाख पौधे नदारद हैं, जबकि वन विभाग अपनी फौरी रिपोर्ट में सिर्फ 25 फीसदी नुकसान मानकर ‘जांच’ चल रही है’और घिसा-पिटा राग अलाप रहा है। जिले में पौधरोपण का कागजी जंगल देखिए तो 2025 में 64 लाख, 2024 में 62 लाख और 2023 में 63 लाख पौधे रोपे गए। तीन साल में 1 करोड़ 89 लाख पौधों का दावा है। अगर ये सच में जमीन पर होते तो बांदा आज ‘छोटा नागपुर’ बन गया होता। पर सच्चाई यह है कि 2025 के 64 लाख में से आधे पौधे गायब हैं। जिम्मेदारी बांटने में भी विभाग पीछे नहीं रहे।
वन विभाग ने 25.51 लाख, पर्यावरण विभाग ने 13.90 लाख, ग्राम्य विकास विभाग ने 22.34 लाख, पुलिस विभाग ने 1.65 लाख पौधे रोपे। सबसे ज्यादा बर्बादी ग्राम्य विकास के हिस्से वाले पौधों की हुई,जहां रोपकर अफसर मुड़कर देखने भी नहीं गए। वन विभाग खुद मान रहा है कि पौधों की मौत के पीछे तीन बड़ी वजहें हैं। पहला, पौधे ऐसी जगह रोप दिए गए जहां पानी का इंतजाम ही नहीं था। दूसरा, तालाबों के किनारे रोपे गए पौधों में सुरक्षात्मक जाली नहीं लगाई गई,नतीजा बकरी-गाय चर गईं। तीसरा, कई जगह मानक के अनुसार 45x45x45 सेमी के गड्ढे ही नहीं खोदे गए। पौधे को रोपा नहीं, बस मिट्टी में दफना दिया गया। अब नुकसान पर पर्दा डालने के लिए जिलास्तरीय वृक्षारोपण समिति बना दी गई है।
समिति 15 दिन तक सूखी टहनियां गिनेगी और फिर बताएगी कि किस विभाग के पौधे ज्यादा मरे। यानी जब तक रिपोर्ट आएगी,अगले साल का 65 लाख का टारगेट और बजट पास हो चुका होगा। स्थानीय लोग तंज कस रहे हैं कि पहले डाकू जंगल में रहते थे, अब जंगल विभाग में रहते हैं। दरअसल बांदा में वन महोत्सव अब ‘वन मर्सिया’ बन गया है। यहां पत्ते नहीं, फाइलें हरी होती हैं। 1.89 करोड़ पौधों का मतलब लगभग 500 करोड़ का बजट है। आधे पौधे मरे यानी 250 करोड़ सीधे स्वाहा। 32 लाख पेड़ सालाना 7.36 लाख टन ऑक्सीजन देते, अब वो सिलेंडर में खरीदनी पड़ेगी। जब तक ‘टारगेट’ की जगह ‘टिकाऊ’ और ‘फोटो’ की जगह ‘फॉलो-अप’ नहीं आएगा, तब तक हर साल 64 लाख संकल्प लेंगे और 32 लाख समाधियां बनाते रहेंगे। याद रहे, पेड़ काटना अपराध है,पर पेड़ के नाम पर बजट काटना यहां ‘विकास’ कहलाता है।
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