- विनोद मिश्रा
बांदा। प्रगतिशील कविता के महान रचनाधर्मी जनकवि बाबू केदारनाथ को साहित्य के जगत में भुला पाना असंभव है। मूल रूप से बांदा जिले के कमासिन गांव में जन्मे केदारनाथ अग्रवाल को लोग ‘बाबू जी’ कहकर बुलाते थे। उनका जन्म 1 अप्रैल 1911 को हुआ, 22 जून सन् 2000 में उन्होंने अंतिम सांस ली। प्रगतिशील रचनाकारों के रूप में उनका नाम शुमार है। कवि, राजनीतिज्ञएवं बांदा जिला अधिवक्ता संघ के पूर्व अध्यक्ष अशोक कुमार त्रि पाठी जीतू उनके साथ बिताए गए पलों के बारे में बताते हुए कहते है कि केदारनाथ अग्रवाल का नाम प्रगतिशील कविता के स्वर्ण युग की याद दिलाता है। वह कहते है कि एक छोटे से गांव से निकलकर साहित्य विधा में उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई। वह एक विशुद्ध साहित्यिक कवि थे। वकालत भी करते थे। यही वजह थी कि वह अपनी रचनाओं पर लोगों से आसानी से बहस भी करते थे।

आपातकाल के समय के बारे में बताते हुए कहते है कि वह मुक्त छंद में लिखते थे। केदारनाथ अग्रवाल ने फूल नहीं रंग बोलते है, नाम से पहली रचना लिखी। इसके बाद उन्होंने युग की गंगा, नींद के बादल, लोक और आलोक, आग का आइना, पंख और पतवार, बोले बोल अनमोल उनकी प्रमुख कृतियों में शुमार है।

उनकी रचनाओं में आम आदमी का दर्द है। उन्होंने आने वाली पीढ़ी के लिए सहेजने वाला साहित्य दिया। हर परिस्थिति में उनकी रचनाएं तर्कसंगत है। उन्हें कवियों का कवि कहा जाए तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि वह एक विशुद्ध साहित्यिक कवि थे।
वास्तव में केदारनाथ अग्रवाल हिन्दी साहित्याकाश के ऐसे नक्षत्र है। जिन्होंने दो सदियों को प्रभावित किया। सच्चे साहित्य के द्वारा रचनाधर्मियों के साथ-साथ आम लोगों का भी मार्गदर्शन किया। उनकी रचनाओं में देश की मिट्टी की सोंधी सुगंध विद्यमान है।

( शरद मिश्रा- संपादक )
( सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश )




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