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करोड़ों की लागत वाले शौचालय हुए 'अनुपयोगी': सरकारी योजना बनी कागज़ी, अफसर खामोश !
उत्तर प्रदेश

करोड़ों की लागत वाले शौचालय हुए ‘अनुपयोगी’: सरकारी योजना बनी कागज़ी, अफसर खामोश !

विनोद कुमार मिश्रा ( सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश )

  • विनोद मिश्रा

बांदा। स्वच्छ भारत मिशन के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर गांव-गांव सामुदायिक शौचालय तो बना दिए गए, लेकिन जिम्मेदारी की चाबी जब सिस्टम के हाथों में आई, तो ताले भी लग गए और तंत्र भी ठप पड़ गया। जिले की 450 ग्राम पंचायतों में लगभग 2 करोड़ रुपये खर्च कर सामुदायिक शौचालय बनाए गए, जिन्हें ओडीएफ घोषित कर शान से प्रचारित भी किया गया। लेकिन हकीकत में, ये शौचालय उपयोग में नहीं, बल्कि उपेक्षा में खड़े हैं। इन शौचालयों की देखरेख की जिम्मेदारी एनआरएलएम से जुड़े स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को दी गई। हर शौचालय संचालन के लिए महिलाओं को 6000 मानदेय और 3000 सामग्री मद में यानी 9000 प्रति माह दिए जा रहे हैं। करीब 4.50 लाख रुपये प्रतिमाह सरकारी फाइलों में खर्च हो रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है !

करोड़ों की लागत वाले शौचालय हुए 'अनुपयोगी': सरकारी योजना बनी कागज़ी, अफसर खामोश !

ग्रामीणों के मुताबिक, “शौचालयों के दरवाजों पर ताले लटके हैं, भीतर बदबू और गंदगी है।” उपयोग की बजाय शादी-ब्याह और त्यौहारों में भी मेहमान खुले में जाने को मजबूर हैं। सरकार की मंशा थी कि जिन घरों में शौचालय नहीं हैं, वे सामुदायिक शौचालयों का प्रयोग करें। लेकिन अधिकांश गांवों में शौचालय ‘बंद पड़े डिब्बे’ बनकर रह गए हैं। स्वच्छ भारत अभियान, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिक योजनाओं में शामिल रहा है, बांदा में अफसरशाही की लापरवाही का शिकार हो गया है। योजना का उद्देश्य था खुले में शौच की समाप्ति, महिलाओं की गरिमा की रक्षा और ग्रामीण स्वच्छता में सुधार, लेकिन जब जिम्मेदारी निभाने की बारी आई, तो न तो पंचायतें जागीं, न अधिकारी निकले निरीक्षण पर।

करोड़ों की लागत वाले शौचालय हुए 'अनुपयोगी': सरकारी योजना बनी कागज़ी, अफसर खामोश !

कुछ महिला केयरटेकरों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया “हम शौचालय खोलते हैं, लेकिन गांव के लोग अंदर इतनी गंदगी कर जाते हैं कि दोबारा साफ करना मुश्किल होता है। लोग सहयोग नहीं करते। कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं।” यह स्थिति स्पष्ट करती है जब तक पंचायत, ग्राम प्रधान, स्वच्छता कर्मी और ग्रामीण एकजुट नहीं होंगे, तब तक ये शौचालय सिर्फ दिखावा बनकर रह जाएंगे। ग्रामीणों ने सवाल खड़े किए हैं कि “जब शौचालयों को इस्तेमाल में नहीं लाना था तो करोड़ों खर्च क्यों किए? क्या सरकार की योजनाएं सिर्फ फोटो खिंचवाने और दीवारों पर नारे लिखने तक सीमित रह गई हैं?” सामुदायिक शौचालयों की यह तस्वीर प्रशासन की असफलता और सरकार की योजनाओं की जमीनी जड़ता को उजागर करती है। खुले में शौच की वापसी, सामुदायिक ढांचे पर सवाल और करोड़ों की बर्बादी /क्या यही है ओडीएफ पंचायतों की असलियत ?

 

 

Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh

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