
- विनोद मिश्रा
बांदा। “न कोई गुरु, न ज्ञान का सार, शिक्षा बनी मज़ाक का व्यापार!” ये पंक्तियाँ जिले के नगर क्षेत्र में संचालित परिषदीय विद्यालयों की वास्तविक तस्वीर बयां कर रही हैं। जिले में शिक्षक और छात्र के अनुपात को संतुलित करने की कवायद चाहे जितनी भी ज़ोर-शोर से चल रही हो, शहर के स्कूलों की हालत बद से बदतर होती जा रही है ! जहां एक ओर सरकारी दस्तावेज़ों में “निपुण भारत मिशन” और नई शिक्षा नीति 2020 के सपने दिखाए जा रहे हैं, वहीं जमीनी हकीकत यह है कि शहर में कई स्कूल ऐसे हैं, जो एक या आधे शिक्षक के सहारे चल रहे हैं !

शहर के गूलरनाका क्षेत्र में जल संस्थान के बगल में स्थित दो परिषदीय विद्यालयों में सिर्फ एक-एक शिक्षिका संबद्ध की गई हैं, जबकि इन विद्यालयों में 100 से अधिक छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं। इंचार्ज प्रधानाध्यापिका रंजना के मुताबिक, उन्हें एक साथ तीन विद्यालयों का चार्ज दिया गया है। ऐसे में न तो पढ़ाई ठीक से हो पा रही है और न ही मिड-डे मील, हाजिरी, मूल्यांकन जैसे प्रशासनिक कार्य समय पर पूरे हो रहे हैं। स्वराज कॉलोनी विद्यालय में एकमात्र शिक्षामित्र के भरोसे पूरे स्कूल की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पुलिस लाइन के प्रधानाध्यापक संतोष कुमार, जिनकी तैनाती एक अन्य विद्यालय में है, वे भी कभी-कभार ही स्वराज कॉलोनी आते हैं। नगर क्षेत्र के 28 परिषदीय विद्यालयों में वर्षों से शिक्षकों की भारी कमी बनी हुई है। शिक्षा विभाग के मानकों के अनुसार, प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्तर पर प्रति 30 से 35 बच्चों पर एक शिक्षक अनिवार्य है, लेकिन बांदा नगर में यह अनुपात 1 शिक्षक: 100 छात्र के पार चला गया है।

शिक्षा विभाग के जानकारों के अनुसार, वर्ष 2010-11 में शिक्षक समायोजन नीति लागू की गई थी ताकि एक जगह शिक्षक अधिक और दूसरी जगह कम होने की समस्या खत्म की जा सके। लेकिन अफसरशाही की लापरवाही के चलते यह नीति ठंडे बस्ते में चली गई। नगर शिक्षा अधिकारी राजेश कुमार ने स्वीकार किया कि नगर और ग्रामीण क्षेत्रों का शिक्षक कैडर अलग-अलग है, और नगर क्षेत्र में वर्षों से कोई नई नियुक्ति या समायोजन नहीं हुआ है। बार-बार मांग की गई, लेकिन ऊपरी स्तर से कोई ठोस पहल नहीं की गई। परिषदीय विद्यालयों की शिक्षक संकट की यह तस्वीर न केवल बच्चों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की नीयत और कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
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