- विनोद मिश्रा
बांदा। गौवंशों के संरक्षण में “प्रशासन की सारी व्यवस्थायें विफल हैं”? हालत तो यही”चीख -चीख कर कह रहें हैं की “ज्यों ज्यों दवा की मर्ज बढ़ता ही गया“। जिला प्रशासन गौवंशों के संरक्षण की सिर्फ कागजी और आंकड़ों की व्यवस्था में हैं। सारी कवायदें बैठक और और यदा -कदा निर्देशों तक ही सीमित हैं। “धरातल में व्यवस्थायें ठन -ठन गोपाल” सी हैं। हालांकि पिछले माहों डीएम दुर्गा शक्ति के आग्रह पर कर्मचारी भी एक दिन के बेतन के रूप में एक करोड़ का चंदा दे चुके हैं।

दरअसल जिला प्रशासन के पास गौसंरक्षण के लिये बजट नहीं हैं। यह बात दीगर हैं की शासन से “करोड़ों आये और गये” हो गये।भूसा के लिये भिक्षामि देह की भी प्रशानिक नौटंकी करनी पड़ रही है ! प्रधानों बतौर चंदा का सहयोग लिया जा रहा है। फिर भी समस्या “जस की तस” हैं। छुट्टा गौवन्स सड़कों पर आम हैं।

गौशाला से ही “भूख से तड़पते जानवरों को रात में गुपचुप छोड़ देने की बातें भी उजागर” हों चुकी हैं। ग्रामीण आरोप लगते हैं की अक्सर रात में गोशाला से गोवंशों को छोड़ दिया जाता है। आंदोलन की चेतावनी दे रहें हैं। हालत कमोवेश पूरे जिले में ऐसी ही है। गौवंश संरक्षण आपदा राहत बिल्कुल फेल सी हो गई है ?
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