
- विनोद मिश्रा
बांदा। आपने बरसाने की लठ मार होली देखी ही होगी, लेकिन बुंदेलखंड की लट्ठ मार दीपावली भी पूरे देश में मशहूर है। जिसमें वीरता का पुट है, और यह नृत्य युद्ध कला को दर्शाता है। बुंदेलखंड में धनतेरस से लेकर दीपावली की दूज तक गांव गांव में दिवारी नृत्य खेलते नौजवानों की टोलियां घूमती हैं।

दिवारी देखने के लिए हज़ारों की भीड़ जुटती है। दिवारी खेलने वाले लोग इस कला को श्री कृष्ण द्वारा ग्वालों को सिखाई गई आत्म रक्षा की कला मानते हैं। दीपावली आते ही इसकी चौपालें गांव से लेकर शहरों तक सज जाती है। यहां प्रत्येक चौपालों पर युवा वृद्ध और बच्चे अपने अपने हांथों में लाठी लाठी डंडों से लेस होकर दिखाई देते हैं, जो लाठियों का अचूक वार करते हुए युद्ध कला को दर्शातें हैं।

बुंदेलखंड का परम्परागत लोक नृत्य दिवारी जिसने न सिर्फ उत्तर प्रदेश में बल्कि पूरे देश में अपनी धूम मचा दी है, इसमें जिमनास्टिक की तरह इनके करतब वाकई में अदभुत हैं। अलग तरह से बज रही ढोलक की थाप खुद ब खुद लोगों को थिरकने के लिए मजबूर कर देती है। बुंदेलखंड की यह परम्परा गांवों और शहरों सभी जगह उत्साह पूर्वक देखी जाती है। अलग वेश भूषा और मजबूत लाठी जब दीवाली लोक नृत्य खेलने वालों के हाथ आती है तो यह कला बुन्देली सभ्यता-परम्परा और वीरता को मजबूत रूप से प्रकट करती है।
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