
- विनोद मिश्रा
बांदा। सुनील पटेल का “जातीय दांव उल्टा पड़ गया” है। जिले में “संगठन की पूर्व और वर्तमान राजनीतिक स्थित ने उनकी पोल खोल” दी है। जिले की राजनीति में इस वक्त “6 करोड़ 21 लाख रुपये” के जिला “पंचायत अध्यक्ष द्वारा घोटाले की गूंज” है ! लेकिन इस आर्थिक अपराध से “बड़ी बहस अब उस जातीय कार्ड” को लेकर है, जिसे घोटाले के मुख्य दोषी जिला पंचायत अध्यक्ष सुनील पटेल मीडिया के सामने बार-बार खेलते नज़र आये हैं। कहते हैं “मुझे ओबीसी होने के कारण निशाना बनाया जा रहा है,” इस बयान के बाद से भाजपा की सियासी में आंधी में सुनील पटेल की दावे की विध्वंस से हो गए है !

सुनील पटेल का “जातीय तर्क साफ तौर पर सवालों के घेरे” में है ? क्योंकि जिले में ज्यादातर भाजपा नेता खुद ओबीसी वर्ग से हैं। जलशक्ति राज्य मंत्री रामकेश निषाद, भाजपा जिलाध्यक्ष कल्लू सिंह राजपूत, पूर्व सांसद आर.के. सिंह पटेल, बबेरू से विधानसभा के पूर्व प्रत्याशी अजय पटेल को पार्टी में महत्व मिला। खुद सुनील पटेल भाजपा के टिकट पर चुनाव जीते। जिले में सिर्फ एक विधायक प्रकाश द्विवेदी सामान्य वर्ग से हैं। फिर जातीय उत्पीड़न का सवाल कहां से उठता है ? क्या सुनील की यह खुद को “राजनीतिक शिकार” साबित करने की नाकाम कोशिश है ?

भाजपा नेताओं का कहना है कि जिस “पार्टी ने सुनील पटेल को सत्ता” दिलाई, उसी पर वह “निशानेबाजी की राजनीति” कर रहें हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके बगल में सवर्ण वर्ग के बसपा नेता जयराम सिंह और सपा नेता बलवान सिंह समर्थन में बैठे दिखे। यह क्या दर्शाता है? इन हालातों में संगठन में गहरी नाराजगी है। यह केवल “भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि भाजपा के खिलाफ भीतरघात है,गहरी साजिश” है !

कयास यह लग रहा है कि क्या सुनील पटेल ने अपने पद का इस्तेमाल केवल अपने हितों के लिए किया ? जिला पंचायत सस्दय सुजाता राजपूत, राकेश राजपूत, नीरज प्रजापति ये तीनो ओबीसी है, सदाशिव अनुरागी (एससी) है। इन सभी निर्वाचित सदस्यों को उनके क्षेत्रों के विकास के लिए समुचित रुपया नहीं दिया क्यों ? जिले की जनता इस पूरे प्रकरण में अब सिर्फ सवाल नहीं उठा रही, सीधे-सीधे “सुनील पटेल की नीयत पर उंगली” उठा रही है। सोशल मीडिया से लेकर पंचायतों तक, एक ही चर्चा है “अगर आप निर्दोष हैं, तो कोर्ट” जाइए, “जाति की आड़ क्यों” ले रहे हैं ? “भ्रष्टाचार को जाति की राजनीति से ढकने की कोशिश क्या लोकतंत्र को कलंकित” नहीं कर रही ? क्या यह “प्रशासनिक व्यवस्था का मजाक उड़ाना” नहीं ?
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