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बांदा के प्रेम सिंह बने "अंतरराष्ट्रीय" रोल मॉडल : 24 देशों तक पहुंची जैविक खेती की गूंज
उत्तर प्रदेश

बांदा के प्रेम सिंह बने “अंतरराष्ट्रीय” रोल मॉडल : 24 देशों तक पहुंची जैविक खेती की गूंज।

विनोद कुमार मिश्रा ( सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश )

  • विनोद मिश्रा

बांदा। बुंदेलखंड की “सूखी धरती पर हरियाली” की एक “अनोखी कहानी लिखी” जा रही है। यह कहानी है एक ऐसे किसान की, जिसने न केवल खुद को खेती में स्थापित किया, बल्कि पूरे क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया। हम बात कर रहे हैं बांदा जिले के बड़ोखर खुर्द गांव के रहने वाले किसान प्रेम सिंह की, जिन्होंने परंपरागत खेती और जैविक तरीकों को अपनाकर देश-दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

बांदा के प्रेम सिंह बने "अंतरराष्ट्रीय" रोल मॉडल : 24 देशों तक पहुंची जैविक खेती की गूंज

प्रेम सिंह ने 1980 के दशक में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमबीए करने के बाद नौकरी की, लेकिन जल्द ही यह महसूस किया कि उनका असली स्थान खेतों में है, न कि दफ्तरों में। उन्होंने नौकरी छोड़कर अपने गांव लौटने का फैसला किया और मात्र 14 एकड़ बंजर भूमि पर खेती शुरू की। उनके इस फैसले को पहले तो लोगों ने पागलपन कहा, लेकिन आज वही लोग उन्हें ‘कृषि क्रांति का अगुआ’ मानते हैं।

बांदा के प्रेम सिंह बने "अंतरराष्ट्रीय" रोल मॉडल : 24 देशों तक पहुंची जैविक खेती की गूंज

प्रेम सिंह ने ‘किसान विद्यापीठ’ की स्थापना की, जो अब एक राष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण केंद्र बन चुका है। यहां देशभर से किसान आकर खेती की नई-पुरानी तकनीकों का प्रशिक्षण लेते हैं। यही नहीं, इज़राइल जैसे देश से भी किसान यहां प्रशिक्षण लेने पहुंच रहे हैं। प्रेम सिंह का मानना है कि पढ़ाई से नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े रहकर ही असली किसान बना जा सकता है। 8वे देशी बीजों के संरक्षण के लिए भी लगातार प्रयास कर रहे हैं।

बांदा के प्रेम सिंह बने "अंतरराष्ट्रीय" रोल मॉडल : 24 देशों तक पहुंची जैविक खेती की गूंज

उनका कहना है कि पहले किसान खुद बीज तैयार करता था, लेकिन आज वही बीज कंपनियों से हजारों रुपये में खरीदना पड़ता है। उन्होंने जैविक खेती को अपनाया और रासायनिक खादों से दूरी बनाई। उनका फार्म अब एक प्रयोगशाला बन गया है, जहां पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक सोच का संगम होता है। प्रेम सिंह की कवायदों का ही परिणाम है कि अब तक 24 से अधिक देशों के वैज्ञानिक, कृषि विशेषज्ञ और किसान उनके मॉडल को देखने और समझने के लिए बांदा आ चुके हैं। वे कहते हैं, “अगर खेती को लाभकारी बनाना है, तो मिट्टी की सेहत को प्राथमिकता देनी होगी और बीजों की आत्मनिर्भरता फिर से कायम करनी होगी।”

 

 

Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh

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