
- शरद मिश्रा
बांदा। शहर की सड़कों पर कानून की ‘धज्जियां उड़’ रही हैं और जिम्मेदार विभाग ‘आंख बंद’ किए बैठा है ! यहां 10वीं-12वीं में पढ़ने वाले नाबालिग बच्चों के हाथों में ई-रिक्शा की स्टीयरिंग है। न ड्राइविंग लाइसेंस, न रजिस्ट्रेशन, न बीमा। फिर भी ये ई-रिक्शा बेखौफ दौड़ रहे हैं। बाबूलाल चौराहा, बस स्टाप कलेक्ट्रेट, स्टेशन रोड और सिविल लाइंस में सुबह से रात तक 15 से 17 साल के बच्चे ओवरलोड ई-रिक्शा चलाते दिख जाएंगे।
तेज रफ्तार, अचानक कट और ट्रैफिक नियमों की अनदेखी इनकी आदत बन चुकी है। नतीजा- रोज छोटे-बड़े हादसे। स्कूली बच्चे, बुजुर्ग और राहगीर इसकी चपेट में आ रहे हैं। नियम साफ कहता है कि ई-रिक्शा चलाने के लिए न्यूनतम उम्र 20 साल और वैध ड्राइविंग लाइसेंस जरूरी है। बिना परमिट और रजिस्ट्रेशन के संचालन अवैध है। लेकिन आरटीओ विभाग की टीम महीने में एक-दो बार निकलती है और सिर्फ दो पहिया वाहनों का चालान काटकर वापस लौट जाती है।
शहरवासियों का सीधा सवाल है जब बाइक सवार का हेलमेट चेक हो सकता है तो ई-रिक्शा के कागज और चालक की उम्र क्यों नहीं ? क्या आरटीओ को सिर्फ मोटरसाइकिल वाले ही दिखाई देते हैं ? पिछले 30 दिन में ई-रिक्शा से जुड़ी 6 से ज्यादा दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। कई बार नाबालिग चालक हादसे के बाद रिक्शा छोड़कर भाग जाते हैं। पीड़ित को न मुआवजा मिलता है न कोई कार्रवाई होती है।
ट्रैफिक विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक आरटीओ विभाग नाबालिग और अवैध ई-रिक्शा के खिलाफ सख्त अभियान नहीं चलाता, तब तक सड़कें असुरक्षित रहेंगी। अभिभावक भी अपने बच्चों को ई-रिक्शा थमाकर उनकी और दूसरों की जान खतरे में डाल रहे हैं। अब देखना होगा कि आरटीओ विभाग कब नींद से जागता है और शहर को नाबालिग चालकों के आतंक से मुक्ति दिलाता है। वरना किसी बड़ी दुर्घटना के बाद जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाएगा।
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