
- विनोद मिश्रा
बांदा। मंडल कारागार में बंदियों की जिंदगी ‘भगवान भरोसे’ है। 567 की क्षमता वाली जेल में इस समय 741 बंदी-कैदी ठूंसे हुए हैं। लेकिन इतनी बड़ी संख्या के बावजूद जेल के पास अपनी एक भी एंबुलेंस नहीं है। नतीजा- किसी की तबीयत बिगड़े तो इलाज के लिए मिनटों की जद्दोजहद। जेल प्रशासन के पास न कोई स्टैंडबाय वाहन है,न मेडिकल इमरजेंसी के लिए त्वरित संसाधन। गंभीर हालत में बंदी को जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज भेजने के लिए बाहर से एंबुलेंस और सुरक्षा बल का इंतजार करना पड़ता है। इसी देरी में कई बार हालत बिगड़ जाती है।
पिछले माह की दो घटनाओं ने इस लापरवाही को उजागर कर दिया। पहले बंदी अभिषेक सिंह ने जेल में आत्महत्या कर ली, फिर बंदी नितीश की मौत हो गई। दोनों ही मामलों में समय पर बेहतर चिकित्सा सुविधा न मिल पाने को लेकर सवाल उठे। सूत्रों का कहना है कि जेल प्रशासन ने कई बार शासन को पत्र लिखकर एंबुलेंस की मांग की, लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई।
कारागार विशेषज्ञ मानते हैं कि भीड़भाड़ वाली जेल में हृदयाघात, झगड़े, आत्महत्या के प्रयास जैसी घटनाएं आम हैं। ऐसे में गोल्डन आवर में इलाज न मिलना सीधे जान पर बन आती है। जेल अधीक्षक शिकांत सिंह का कहना है कि एंबुलेंस की मांग फिर से उच्चाधिकारियों को भेजी गई है। लेकिन सवाल यह है कि 741 बंदियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी निभाने वाली जेल कब तक बाहरी साधनों के भरोसे चलेगी? बंदियों की संख्या बढ़ रही है, बीमारियां बढ़ रही हैं, घटनाएं बढ़ रही हैं लेकिन व्यवस्था वहीं की वहीं है। अब जरूरत सुविधा की नहीं, जरूरत जान बचाने के इंतजाम की है।
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