
- विनोद मिश्रा
बांदा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘माफियाओं को मिट्टी में मिला देंगे’ के ऐलान के बीच बांदा से एक बड़ी चुनौती सामने आ गई है ! मौलाना नजीब अहमद और उनके परिवार पर अवैध तरीके से अकूत नामी-बेनामी जमीन और संपत्ति अर्जित करने के गंभीर आरोप लगने की श्रंखला जारी हैं? इसकी जांच भी एसआईटी एवं अपराध शाखा से उच्चस्तरीय जांच की मांग ‘लू के थपेड़ों’ की तरह ‘गर्म’ हो गई है।
आरोपों के मुताबिक मौलाना नजीब को ‘छुपा रुस्तम भूमाफिया’ कहा जा रहा है। जिन्होंनें कथित माफियागिरी के तहत पूरे देश के अधिकांश हिस्सों में अरबों की नामी बेनामी अकूत संपदा एकत्रित कर सीएम योगी के सामने माफिया डान सा बनकर आँखें तरेर रहे हैं? मौलाना का नया एपिसोड पढ़िये। साल 2000 से 2022 तक संस्थाओं के नाम हुई जमीनों की खरीद-फरोख्त पर सवाल उठाए गए हैं ! वर्ष 2000 का सहेवा कांड नें भी गजब तरीके से कानून की लईया करारी कर दी है? ग्राम सहेवा तहसील अतर्रा में ‘इदारा फैज सिद्दीक, हथौड़ा’ के नाम गाटा संख्या 369 की भूमि खरीदी थी। यह भूमि संयुक्त खाते में चार लोगों ज़फर अली, मुशरफ अली औऱ शमीम बेगम के नाम दर्ज थी।
आरोप है की वास्तविक विक्रेता ज़फर अली औऱ नौशाद अली थे, लेकिन मौलाना हबीब अहमद नें कथित तौर पर ज़फर अली औऱ शमीम बेगम की जगह दूसरे व्यक्त्तियों को खड़ा कर मिली भगत से रजिस्ट्री करा ली। इसी तरह 5 सितंबर 2022 को प्रबंधक मौलाना नजीब अहमद नें संस्था मसजिद रहमानिया ग्राम हथौड़ा के नाम ग्राम छनेहरा लालपुर तहसील बांदा की गाटा संख्या 46, क्षेत्रफल 3.0616 हेक्टेयर भूमि खरीदी। यह “जमीन नगीना खातून पत्नी सगीर अहमद” निवासी करबई के नाम दर्ज थी। यहां गजब का खुलासा यह है की चार लाख रुपये प्रति बीघा की दर से विक्रेता को धन राशि दी गई ! लेकिन रजिस्ट्री दान पत्र के आधार पर कराया गया। यहां यह मुख्य रूप से विचारणीय है की आठ दस बीघे का गरीब किसान दान पत्र के आधार पर अपनी जमीन का बैनामा क्यों करेगा? इसी क्रम में 1988 से अब तक बांदा व अन्य जिलों में संस्थाओं के नाम खरीदी जमीनों में कीमत कम दिखाकर राजस्व को करोड़ों की चपत लगाने का आरोप भी गरमाया हुआ है?
इसी तरह गाटा संख्या 122/498 की भूमि 0.2130 क्षेत्रफल जो मोहम्मद इस्माइल के नाम दर्ज है, पर कथित तौर पर कब्जा कर मदरसे की बाउंड्री में शामिल करने का आरोप है, जबकि मालगुजारी अब भी भूमि का मूल स्वामी भर रहा है ! आरोपों की गंभीरता यह भी बताई जाती है कि आवाज उठाने वालों को कथित तौर पर रसूख के दम पर फर्जी मुकदमों में फंसाया जाता है ! ‘सुविधाशुल्क’ देकर प्रशासनिक कार्रवाई रोकने के भी आरोप लग रहे हैं।
सवाल उठ रहा है कि “योगी सरकार” के “एंटी-माफिया अभियान” के बावजूद यह कथित ‘साम्राज्य’ कैसे “फल-फूल” रहा है? अब गेंद डीएम अमित आसेरी के पाले में है। स्थानीय लोगों की मांग है कि पूरे मामले में एफआईआर दर्ज कर एस आईटी गठित की जाए ! 1988 से अब तक की सभी रजिस्ट्रियों, स्टांप, कब्जे और वित्तीय लेनदेन की जांच अनिवार्य है। कुल मिलाकर यह मामला सीधे मुख्यमंत्री योगी के ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावे की परीक्षा बन गया है।
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