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तीन करोड़ खर्च: आठ सौ सफाईकर्मी 'लापता', सिस्टम की खुली पोल !
उत्तर प्रदेश

तीन करोड़ खर्च: आठ सौ सफाईकर्मी ‘लापता’, सिस्टम की खुली पोल !

शरद मिश्रा सम्पादक सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश

  • शरद मिश्रा

बांदा। सरकार गांवों को “स्वच्छ और स्वस्थ” बनाने के लिए “करोड़ों रुपये खर्च” कर रही है, लेकिन बांदा जिले की “हकीकत इस दावे को आईना” दिखा रही है। यहां हर साल करीब 3 करोड़ रुपये “सफाईकर्मियों के वेतन पर खर्च” होने के बावजूद गांवों की “सफाई व्यवस्था पूरी तरह चरमराई” हुई है।

तीन करोड़ खर्च: आठ सौ सफाईकर्मी 'लापता', सिस्टम की खुली पोल !

जिले में तैनात करीब 800 सफाई कर्मचारियों में से बड़ी संख्या अपने मूल कार्यस्थलों पर नहीं पहुंच रहे है। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से लगभग एक चौथाई कर्मचारी जिला, तहसील और ब्लॉक मुख्यालयों में जमे हुए हैं, जिससे गांवों में गंदगी का अंबार लगा हुआ है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत गांवों को साफ रखने के लिए भारी बजट खर्च किया जा रहा है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि गांवों में कूड़े के ढेर, नालियों की बदबू और गंदगी से लोग परेशान हैं। वहीं, जिन सफाईकर्मियों को गांवों में तैनात किया गया है, वे दफ्तरों में अपनी ‘सेवा’ दे रहे हैं।

डीएम जे रीभा की मंशा क्या होगी पूरी ? कठिन डगर है पनघट की !

आंकड़ों के अनुसार, बसपा शासनकाल में नियुक्त 771 स्थायी और 24 अस्थायी सफाई कर्मचारी गांवों के लिए लगाए गए थे, लेकिन अफसरों की लापरवाही ने पूरी व्यवस्था को खोखला कर दिया है। लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व तत्कालीन जिलाधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल ने इस गड़बड़ी को गंभीरता से लेते हुए मुख्यालयों में तैनात सफाईकर्मियों की संबद्धता समाप्त करने के निर्देश दिए थे। डीपीआरओ ने आदेश जारी भी कर दिया, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं हुआ।

 

डीएम जे रीभा की मंशा क्या होगी पूरी ? कठिन डगर है पनघट की !

हकीकत यह है कि एक भी कर्मचारी अपने मूल तैनाती स्थान पर वापस नहीं गया। इससे साफ है कि आदेश केवल कागजों तक सीमित रह गए और सिस्टम ने उसे गंभीरता से नहीं लिया। जब कर्मचारी गांवों में मौजूद ही नहीं होंगे, तो सफाई कैसे होगी? और जब करोड़ों रुपये वेतन में खर्च हो रहे हैं, तो उसका लाभ जनता को क्यों नहीं मिल रहा? यह मामला सीधे-सीधे स्वच्छ भारत मिशन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। गंदगी के चलते गांवों में मच्छर और संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ गया है। ग्रामीणों का कहना है कि सफाई न होने से बीमारियों का डर बना रहता है। अब बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या करोड़ों रुपये सिर्फ कागजों में खर्च दिखाने के लिए हैं? क्या जिम्मेदार अधिकारी इस लापरवाही पर चुप्पी साधे रहेंगे?

 

 

Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh

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