- ब्यूरो रिपोर्ट
लखनऊ। तराई में किसान सब्सिडी वाली यूरिया खाद के लिए दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन यही खाद सीमा पार नेपाल में खुलेआम बिक रही है। सरकारी दुकानों पर जहां किसानों को यूरिया नहीं मिल रही, वहीं भारत सरकार की सब्सिडी वाली यूरिया नेपाल के बांके जिले में 1800 से 2000 रुपये प्रति बोरी में बेची जा रही है। इस पूरे खेल में तस्कर एक बोरी पर 1200 से 1500 रुपये तक का मुनाफा कमा रहे हैं। यह सब उस समय हो रहा है, जब शासन ने हाल ही में खाद की कालाबाजारी पर कार्रवाई करते हुए 12 दुकानों के लाइसेंस निलंबित किए और 17 दुकानों को नोटिस जारी किए थे।

पड़ोसी देश नेपाल में की गई पड़ताल में सामने आया कि बांके जिले के बेतहनी चौक के आसपास आधा दर्जन से अधिक किराना दुकानों पर भारतीय सब्सिडी वाली यूरिया खाद खुलेआम बिक रही है। बोरियों पर साफ लिखा मिला “भारत सरकार द्वारा सब्सिडीयुक्त”। दुकानदारों ने बिना झिझक यूरिया की कीमत 1800 से 2000 रुपये प्रति बोरी बताई। यानी भारत में 267 रुपये में मिलने वाली यूरिया नेपाल में सात से आठ गुना महंगी बिक रही है।

तराई क्षेत्र के किसान रबी की फसल के लिए यूरिया की तलाश में सरकारी और निजी दुकानों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ रहा है। दूसरी ओर, सीमा पार अनुदानित खाद की भारी आपूर्ति के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं। सूत्रों के मुताबिक यूरिया की तस्करी बहराइच जिले के गंगापुर, गुलरिहा समेत कई खुली पगडंडियों के जरिए की जा रही है। दिन में छोटी-छोटी बोरियों में खाद को खेतों में छिड़काव का बहाना बनाकर सीमा पार कराया जाता है। रात में पूरी की पूरी बोरियां बिना किसी रोक-टोक के नेपाल पहुंचा दी जाती हैं।

सूत्र बताते हैं कि तस्कर यूरिया को बहराइच के नवाबगंज, नूरी चौराहा, बाबागंज और श्रावस्ती के मल्हीपुर, माल्ही चौराहा के पास स्थित निजी दुकानों और सहकारी समितियों से खरीदते हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में एक बोरी यूरिया 350 से 450 रुपये में खरीदी जाती है। इसमें दुकानदार को 120 से 200 रुपये प्रति बोरी का अतिरिक्त लाभ मिलता है। तस्कर 100 से 150 रुपये देकर यूरिया को बॉर्डर पार करवाते हैं। इसके बाद नेपाल के स्थानीय दुकानदार अपना मुनाफा जोड़कर भारतीय सब्सिडी वाली यूरिया को 1800 से 2000 रुपये में बेच देते हैं। इस तरह एक बोरी यूरिया पर कई हाथों में हजारों रुपये का खेल हो रहा है। गौरतलब है कि 17 दिसंबर को ई-पॉश मशीन की जांच में रात में खाद बिक्री का खुलासा हुआ था। इसके बावजूद न तो तस्करी थमी और न ही किसानों को राहत मिली।
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