
- विनोद मिश्रा
बांदा। कला और रोजगार का संगम कहे जाने वाला “शजर पत्थर उद्योग” अब भ्रष्टाचार का प्रतीक बन चुका है। सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद उद्योग विभाग “एक जिला–एक उत्पाद” योजना की “आत्मा को चबा” गया। प्रशिक्षण और रोजगार के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए, मगर न नया कारीगर बना, न कोई नया कारोबार शुरू हुआ।

हैरानी की बात यह है कि पूरा विभाग केवल एक ही कारीगर और उसके परिवार पर केंद्रित है ! यही व्यक्ति हर सरकारी योजना, हर प्रदर्शनी और हर सम्मान में शामिल होता है। बाक़ी हजारों बेरोजगार युवाओं के लिए यह योजना सिर्फ कागज़ और फोटो तक सीमित रह गई है।

शजर पत्थर के काम को बढ़ावा देने के लिए 2018 में “एक जिला-एक उत्पाद” योजना के तहत बांदा को चुना गया था। लक्ष्य था स्थानीय कारीगरों को प्रशिक्षित करना, उन्हें शजर कटिंग की तकनीक सिखाना और बाजार से जोड़ना। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि करीब 18 सौ युवाओं, महिलाओं और पुरुषों को कागजों में प्रशिक्षित दिखाकर करोड़ों रुपये खर्च दिखा दिए गए ? विभाग ने प्रशिक्षण के नाम पर दो-दो हज़ार की “शजर किट” और कभी 20 हज़ार की सामग्री “रेवड़ी की तरह” बांट दी ! जिनके घर ये किट पहुंचीं, उन्होंने कभी उसका इस्तेमाल तक नहीं किया। कई जगह यह किट कबाड़ में पड़ी मिली।

उद्योग विभाग की फाइलों में आज भी सिर्फ एक ही नाम चमक रहा है वही कारीगर, वही कारोबारी, और अब वही उसका परिवार। विभाग की मेहरबानी से यह पूरा परिवार अब सरकारी योजनाओं का “एकमात्र लाभार्थी” बन चुका है। बैंक से लाखों का ऋण, योजनाओं में प्राथमिकता, और देश-विदेश की प्रदर्शनी में प्रतिनिधित्व सब कुछ इसी परिवार के नाम। जब कभी बांदा में स्थानीय प्रदर्शनी लगती है, तो यही “कारीगर” रहस्यमय तरीके से नदारद हो जाता है। लेकिन दिल्ली, लखनऊ या विदेश में शो लगे तो यह ‘चेहरा हर पोस्टर’ पर दिखता है।

शजर पत्थर की यह कला केन नदी की पहचान है, जिसे सरकार ने “अंतरराष्ट्रीय पहचान” दिलाने का वादा किया था। पर विभाग के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि प्रशिक्षण शिविरों में सिर्फ खानापूरी हुई। न मशीनें आईं, न रॉ मटेरियल दिया गया। फोटो खिंचवाकर रिपोर्ट भेज दी गई और बजट हजम कर लिया गया। कई प्रशिक्षुओं को तो आज तक यह भी नहीं पता कि “शजर पत्थर” दिखता कैसा है। पूरे खेल में उद्योग विभाग की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जिला उद्योग अधिकारी कुछ पूछने पर ‘कतरा’ जाते हैं।
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