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August 26, 2026
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जल संरक्षण ‘घोटाला’: पुरस्कार की चकाचौंध में डूबे हजारों तालाब, आंकड़ों की माया उजागर
उत्तर प्रदेश

जल संरक्षण ‘घोटाला’: पुरस्कार की चकाचौंध में डूबे हजारों तालाब, आंकड़ों की माया उजागर

 

  • विनोद मिश्रा

बांदा। राष्ट्रीय जल संरक्षण पुरस्कार से नवाजे जाने वाले बांदा जिले में तालाबों की हकीकत बेहद कड़वी है। जहां एक ओर प्रशासन पांच हजार नए तालाब बनवाने का दावा कर वाहवाही लूट रहा है, वहीं दूसरी ओर जिले के 2575 पारंपरिक तालाबों का कोई नामो-निशान तक नहीं बचा। सैकड़ों जल-स्रोत राजस्व अभिलेखों से गायब हो चुके हैं। गांव से लेकर शहर तक ‘जल संरक्षण की कहानी सिर्फ झूठे आंकड़ों पर टिकी’ है।

जल संरक्षण ‘घोटाला’: पुरस्कार की चकाचौंध में डूबे हजारों तालाब, आंकड़ों की माया उजागर

दरअसल, पिछले दो वर्षों में हुए सर्वे में चौंकाने वाले खुलासे हुए। 602 तालाब तो ऐसे हैं जो प्रशासन की तमाम कोशिशों के बावजूद “ढूंढे से भी नहीं मिले।” बताया जाता है कि कई पुराने तालाबों की महज मरम्मत कराकर उन्हें “नया” बताकर आंकड़ों में शामिल किया गया और इसी खेल के आधार पर जिले को राष्ट्रीय जल संरक्षण पुरस्कार दे दिया गया। बांदा शहर के हृदयस्थल में मौजूद प्रागी तालाब, कंधरदास तालाब, छाबी तालाब और परशुराम तालाब बदहाली के प्रतीक बन चुके हैं।

जल संरक्षण ‘घोटाला’: पुरस्कार की चकाचौंध में डूबे हजारों तालाब, आंकड़ों की माया उजागर

छाबी तालाब बच्चों के खेल का मैदान बन गया हैं। कभी संस्कृति, समाज और पर्यावरण की धड़कन रहे ये तालाब अब अतिक्रमण और उपेक्षा की बलि चढ़ चुके हैं। न तो इनकी साफ-सफाई हो रही, न ही कोई संरक्षण योजना जमीन पर दिखाई देती है।मटौंध नगर और ग्रामीण इलाकों में भी हालात यही हैं। तालाब सूख चुके हैं, कई में निर्माण कार्य कर कब्जा कर लिया गया है। मनरेगा के तहत खोदे गए कई तालाब भी कागजों पर ही सीमित रहे। वहीं, सपा शासन काल की खेत-तालाब योजना भी धरातल पर बेहद कमजोर दिखी।

जल संरक्षण ‘घोटाला’: पुरस्कार की चकाचौंध में डूबे हजारों तालाब, आंकड़ों की माया उजागर

एक रिपोर्ट के अनुसार, 2012 तक बुंदेलखंड के 2069 पारंपरिक तालाब राजस्व रिकॉर्ड से गायब हो चुके थे। शासन द्वारा तय की गई जल संरक्षण की गाइडलाइन की सरेआम अनदेखी की गई। ग्राम पंचायतों के “अमृत सरोवर” के नाम पर कई तालाबों को केवल रंग-रोगन कर पेश किया गया। न गुणवत्ता की जांच हुई, न स्थायी समाधान की सोच दिखाई दी। बांदा को जल संरक्षित जिला कहकर भले ही पुरस्कारों की सूची में ऊपर रखा गया हो, लेकिन हकीकत में यहां जल संकट के बीज गहरे बोए जा चुके हैं।

 

 

Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh

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