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बांदा में "दिल" नहीं बन पा रहा "दिलदार" "रूठने" पर नहीं मनाने वाला "तारणहार हार" !
उत्तर प्रदेश

बांदा में “दिल” नहीं बन पा रहा “दिलदार” “रूठने” पर नहीं मनाने वाला “तारणहार हार” !

  • विनोद मिश्रा

बांदा। जिले में “दिल” दिलदार की जगह इस स्थिति में है “रुक जा रे रुक जा” क्योंकि इसको गतिमान और शक्तिवान बनाने के लिये न तो परीक्षक है न रैफरी। अब मैं सीधे शब्दों में खबर समझाता हूँ। जिले की आबादी लगभग बीस लाख है,लेकिन आश्चर्य है जिले के सरकारी अस्पतालों में हृदय रोग और किडनी के मरीजों के इलाज के लिए विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं हैं।

बांदा में "दिल" नहीं बन पा रहा "दिलदार" "रूठने" पर नहीं मनाने वाला "तारणहार हार" !
In Banda, the “heart” is not able to become “heartfelt” but the one who does not convince the “savior defeat”!

रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज को शुरू हुए छह साल हो गए हैं, लेकिन अभी तक किडनी और हृदय रोग विशेषज्ञों की नियुक्ति नहीं है। मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल में पीपीपी मॉडल पर डायलिसिस यूनिट संचालित हैं, पर नेफ्रोलॉजिस्ट नहीं है। डायलिसिस की जिम्मेदारी टेक्नीशियन के हवाले हैं।

बांदा में "दिल" नहीं बन पा रहा "दिलदार" "रूठने" पर नहीं मनाने वाला "तारणहार हार" !
In Banda, the “heart” is not able to become “heartfelt” but the one who does not convince the “savior defeat”!

मंडल के बांदा सहित महोबा, हमीरपुर व चित्रकूट और मध्य प्रदेश के पन्ना व छतरपुर जिले तक के मरीज यहां इलाज के लिए आते हैं। इन रोगों के मरीजों को कानपुर, लखनऊ और प्रयागराज जाना पड़ता है। हृदय रोगियों की जांच के नाम पर सिर्फ ईसीजी की व्यवस्था है। मेडिकल कॉलेज प्राचार्य डॉ. मुकेश कुमार यादव ने बताया कि दोनों रोगों के विशेषज्ञों की तैनाती के लिए कई बार शासन को पत्र भेजा, लेकिन अब तक निराशा ही है। रोजाना 8-10 हृदय रोगी इलाज के लिए आते हैं। इनमें दो-तीन गंभीर मरीज होते हैं, जिन्हें सुविधाओं के अभाव में रेफर करना मजबूरी है।

बांदा में "दिल" नहीं बन पा रहा "दिलदार" "रूठने" पर नहीं मनाने वाला "तारणहार हार" !
In Banda, the “heart” is not able to become “heartfelt” but the one who does not convince the “savior defeat”!

जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ.एसएन मिश्रा ने बताया कि दो साल पूर्व हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. केएल पांडेय के सेवानिवृत्त होने के बाद से यह पद रिक्त खाली है। फिजीशियन डॉ. शिशिर चतुर्वेदी फिलहाल हृदय रोगियों को देख रहे हैं। जांच के नाम पर सिर्फ ईसीजी की व्यवस्था है। यहां रोजाना 25-30 हृदय रोगी ओपीडी में आते हैं। जांच के आधार पर 7-8 गंभीर रोगियों को रोजाना रेफर किया जाता है। दस बेड का डायलिसिस यूनिट है। यहां तीन टेक्नीशियन हैं। मरीजों की मुफ्त डायलिसिस होती है, लेकिन नेफ्रोलॉजिस्ट न होने पर काम टेक्नीशियन करते है।

 

 

 

Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh

 
 



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