– सास से प्रेरणा लेकर रजनी ने कराई नसबंदी
– लोगों को सामाजिक जिम्मेदारियों का करा रहीं एहसास
– आज मनाया जाएगा खुशहाल परिवार दिवस
- विनोद मिश्रा
बांदा। परिवार, समाज और देश के विकास में एक महिला बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसे महुआ गांव की रजनी साबित कर रही हैं। दो बच्चों के बाद परिवार नियोजन अपनाने के लिए नसबंदी कराई।अब गांव में दूसरों को भी परिवार नियोजन अपनाने के लिए जागरूक कर रही हैं। इस काम में उसका परिवार भी पूरा सहयोग दे रहा है।

शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर बांदा-प्रयागराज रोड पर बसे महुआ गांव में रजनी ने परिवार नियोजन में अपना योगदान देकर मिसाल कायम की है। उसकी शादी 11 साल पहले आशीष साहू के साथ हुई थी। उसके दो बच्चे हैं। रजनी ने बताया कि उसकी सास विमला साहू गांव में आशा कार्यकर्ता के पद पर तैनात हैं। उन्हीं की प्रेरणा से उसने परिवार नियोजन अपनाने का फैसला लिया और चार साल पहले नसबंदी कराई। अब अपनी सास के साथ कंधे से कंधा मिलाकर गांव में महिलाओं को जागरूक कर रही है। रजनी की बातों से प्रेरित होकर 5 महिलाएं नसबंदी करवाई है। 13 महिलाओं ने अंतरा इंजेक्शन लगवा कर बच्चों में अंतर रखने का तरीका अपनाया है। इसके अलावा कई महिलाएं छाया, माला डी एन टेबलेट का इस्तेमाल कर रही हैं। प्रत्येक माह की 21 तारीख को मनाए जाने वाले खुशहाल परिवार दिवस के लिए रजनी का कहना है कि इसे दिवस नहीं बल्कि त्योहार के रूप मनाएं। स्वास्थ्य केंद्र आकर अपनी पसंद से परिवार नियोजन का कोई भी संसाधन अपना सकते हैं। परिवार नियोजन से ही मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम किया जा सकता है। महिला स्वस्थ होगी तभी परिवार भी स्वस्थ रहेगा। लोगों को सामाजिक जिम्मेदारियों का
एहसास कराने के लिए वह बेझिझक घर-घर दस्तक दे रही हैं।

मंडलीय परियोजना प्रबंधक आलोक कुमार और मंडलीय लाजिस्टिक मैनेजर अमृता राज ने रजनी की सराहना करते हुए कहा कि परिवार नियोजन को बढ़ावा देने के लिए हर माह 21 तारीख को खुशहाल परिवार दिवस मनाया जाता है। रजनी से प्रेरणा लेकर अन्य लोगों को भी इसमें आगे आकर परिवार नियोजन अपनाना चाहिए।
इनसेट
बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ का भी दे रहीं संदेश

बांदा। रजनी सीमित परिवार के साथ बच्चों की शिक्षा के लिए भी लोगों को प्रेरित कर रही हैं। उसका कहना है कि मौजूदा समय में बेटियों की शिक्षा और सुरक्षा दोनों ही बेहद जरूरी हैं। कुछ लोग अभी भी बेटा-बेटी में भेदभाव करते हैं। बेटे के चाह में बेटियों की क्षमताओं को अनदेखा करते हैं। जबकि आज बेटियां पढ़-लिखकर किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से पीछे नहीं हैं।

( शरद मिश्रा- संपादक )
(सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश )
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