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बुंदेलखंड में बच्चियां करती हैं तर्पण, धीरे-धीरे लुप्‍त हो रही अनूठी परंपरा महबुलिया
उत्तर प्रदेश

पितृपक्ष में बुंदेलखंड की महबुलिया पूजन प्रथा : विलुप्तता संस्कृति की छाई घटा

  • विनोद मिश्रा

बांदा। पितृ पक्ष में पुरखों की याद में विशेष पूजा अर्चना की बुंदेलखंड में अनूठी परंपरा “महबुलिया” पूजा विलुप्त सी हो गई है। लगभग तीस दशक पूर्व “महबुलिया” इस क्षेत्र की ऐसी अनूठी परंपरा थी, जिसमें घर के बुर्जुग नहीं बल्कि छोटे छोटे बच्चे हिस्सा लेते थे। बुंदेलखंड में लोक जीवन के विविध रंगों में पितृपक्ष पर पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और समर्पण का यह अंदाज जुदा है,जो अब यदा -कहीं ही होता है।

पितृपक्ष में बुंदेलखंड की महबुलिया पूजन प्रथा : विलुप्तता संस्कृति की छाई घटा
Mahbulia worship practice of Bundelkhand in Pitru Paksha: The shadow of extinction culture has decreased

पुरखों के तर्पण के लिए यहां पूजन, अनुष्ठान और श्राद्ध आदि के आयोजनों के अतिरिक्त बच्चों व बालिकाओं की “महबुलिया” पूजा बेहद खास है, जो नई पीढ़ी को संस्कार सिखाती है। पूरे पंद्रह दिन तक चलने वाले इस कार्यक्रम में गोधूलि वेला पर हर रोज पितृ आवाहन और विसर्जन के साथ इसका आयोजनअब भी दिखाई पड़ जाता है जो यहां के गांवों की गलियां तथा चौबारे महबुलिया के लोक गीतों से झंकृत हो उठते हैं।

पितृपक्ष में बुंदेलखंड की महबुलिया पूजन प्रथा : विलुप्तता संस्कृति की छाई घटा
Mahbulia worship practice of Bundelkhand in Pitru Paksha: The shadow of extinction culture has decreased

समूचे विंध्य क्षेत्र में लोकपर्व का दर्जा प्राप्त महबुलिया की पूजा का भी अपना अलग ही तरीका है। बच्चे कई समूहों में बंटकर इसका आयोजन करते हैं। महबुल को एक कांटेदार झाड़ में रंग बिरंगे फूलों और पत्तियों से सजाया जाता है। विधिवत पूजन के उपरांत उक्त सजे हुए झाड़ को बच्चे गाते बजाते हुए गांव के किसी तालाब या पोखर में ले जाते हैं। जहां फूलों को कांटों से अलग कर पानी में विसर्जित कर दिया जाता है। विसर्जन के उपरांत बच्चे राहगीरों को भीगी हुई चने की दाल और लाई का प्रसाद बांटते हैं।

पितृपक्ष में बुंदेलखंड की महबुलिया पूजन प्रथा : विलुप्तता संस्कृति की छाई घटा
Mahbulia worship practice of Bundelkhand in Pitru Paksha: The shadow of extinction culture has decreased

महबुलिया यहां की बिल्कुल अनूठी परंपरा है। पितृपक्ष में बुजुर्ग जहां सादगी के साथ पुरखों के पूजन तर्पण आदि में व्यस्त रहते हैं तब महबुलिया पूजन के लिए बालिकाओं की चहल पहल खामोशी तोड़ती है। वातावरण को खुशनुमा बनाती है। मान्यता है कि पूर्व में कभी महबुलिया नाम की एक वृद्ध महिला थी, जिसने इस विशेष पूजा की शुरुआत की थी। बाद में इसका नाम ही महबुलिया पड़ गया। बदलते दौर में सांस्कृतिक मूल्यों के तेजी से ह्रास होने के कारण महबुलिया भी प्रायः विलुप्त हो चली है।

 

 

 

Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh

 
 



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