- विनोद मिश्रा
बांदा। “चिंगारी कोई भड़के तो सावन आग बुझाये, जब सावन आग लगाये उसे कौन बुझाये”। यह हाल यहां प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों का है। कमीशन की दवाओं के चलते डॉक्टर सपोर्ट नहीं करते! डॉक्टर वही दवा लिखते है जिसमें उन्हें कमीशन के रूप में “श्री लक्ष्मी जी सदा सहाय” !

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र में कुल 1400 प्रकार की दवाई बनती है,और करीबन 200 प्रकार के सर्जिकल प्रोडक्ट है। लेकिन डॉक्टर के सहयोग न करने के कारण जन औषधि केंद्र संचालक सिर्फ 200 से 300 प्रकार की दवाई मगाते हैं।

अब खेल समझिये ! डॉक्टर पर्चे में अपना ब्रांड नेम लिखता है,और जन औषधि केंद्र में आने वाली दवाई साल्ट नेम के आधार पर आती है । इसलिए संचालकों को मरीज को संतुष्ट करने में बहुत समस्या आती है । यहां कुल 5 जन औषधि केंद्र है । जिसमें कालू कुआं में तैनात फार्मासिस्ट प्रीतेश भारत मिश्रा का कार्य व्यवहार एवं मरीजों को समझाने का तरीका उत्तम है। इन केंद्रों में कई प्रकार की दवाएं बहुत ही सस्ते में है। मरीज को 60 प्रतिशत पैसों की बचत होती है।

शहर में चल रहे पांच जन औषधि केंद्रों में तीन जन औषधि केंद्र स्वतंत्र प्रभार है और बाकी के दो जन औषधि केंद्र एक टेंडर के अनुसार ठेके पर चल रहे हैं,जो कि जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में है। वहां के संचालक एक अपने वेतनमान में काम कर रहे हैं उनको यह मतलब नहीं कि यह योजना गरीबों तक पहुंचे या नहीं। बाकी के 3 स्वतंत्र प्रभार हैं! इन्हे डाक्टर्स सहयोग और योजना को अंजाम तक पहुंचाने की बजाय पलीता लगा रहें हैं।

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