
- विनोद मिश्रा
बांदा। जिला पंचायत अध्यक्ष सुनील पटेल की कुर्सी अब लोकतंत्र नहीं, तानाशाही का प्रतीक बन गई है। जिला पंचायत द्वारा संचालित कृषि महाविद्यालय के कर्मचारियों के साथ जो हुआ, वो न सिर्फ शासन की गाइडलाइन के खिलाफ है, बल्कि इंसाफ और नैतिकता को खुलेआम ठेंगा दिखाने जैसा है। कृषि महाविद्यालय में नियुक्त कर्मचारियों की जबरन हाजिरी और मानदेय रोकने और अपने खास लोगों को चुपचाप बहाल कर वेतन जारी कराने का मामला अब तूल पकड़ रहा है। सुनील पटेल की तानाशाही का यह ताजा खुलासा जिले की प्रशासनिक पारदर्शिता और न्याय के बुनियादी सिद्धांतों पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है?

सूत्रों के मुताबिक, अध्यक्ष सुनील पटेल ने पिछले वर्ष सितंबर माह में जिला पंचायत कृषि महाविद्यालय में वर्षों से कार्यरत 11 कर्मचारियों की उपस्थिति दर्ज करने और मानदेय भुगतान पर मौखिक आदेश से रोक लगा दी थी। न तो किसी को कारण बताओ नोटिस दिया गया,न ही कोई विभागीय जांच। बिना किसी चेतावनी और प्रक्रिया के इन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। हैरानी की बात यह है कि जिन कर्मचारियों को हटाया गया, उन्हीं में से कुछ के काम से प्रभावित होकर खुद अध्यक्ष ने एक माह पूर्व ही उनका मानदेय भी बढ़ाया था।

इतना ही नहीं, इनमें से एक वरिष्ठ कर्मचारी रामनिवास सिंह को न्यायालय से आदेश मिलने के बाद ही बहाल किया गया, जिससे स्पष्ट हो गया कि पूरी कार्रवाई मनमानी और पक्षपातपूर्ण थी। शेष कर्मचारियों को अध्यक्ष लगातार सिर्फ आश्वासन देते रहे “धैर्य रखो, देखेंगे”, “बहाल कर देंगे” लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई। इस पूरे घटनाक्रम में चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब सुनील पटेल ने अपने खास माने जाने वाले तीन कर्मचारियों धर्मेंद्र पटेल, कमलेश पटेल और अनूप कुमार श्रीवास्तव की चुपचाप बहाली कर दी और उनका रोका गया मानदेय भी जारी कर दिया। इनमें धर्मेंद्र पटेल का नाम खासतौर पर चर्चा में है, जो सुनील पटेल के बेहद करीबी माने जाते हैं।

आरोप है कि धर्मेंद्र पटेल वही व्यक्ति हैं जिन्होंने बबेरू बुलडोजर कांड में सहकारी समिति के अध्यक्ष पद का दुरुपयोग करते हुए भाजपा कार्यकर्ता राजेंद्र पांडे के मकान पर बुलडोजर चलवाने के लिए प्रस्ताव पास कराया ! इस पक्षपातपूर्ण बहाली के खुलासे से महाविद्यालय में कार्यरत शेष पीड़ित कर्मचारियों में रोष है। वे अब प्रशासन को सामूहिक ज्ञापन देने की तैयारी में हैं। सूत्रों की मानें तो पीड़ित कर्मचारी जल्द ही जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन कर सकते हैं और सुनील पटेल के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेंगे। कर्मचारियों का कहना है कि यह केवल नौकरी की लड़ाई नहीं है, यह न्याय, सम्मान और सरकारी सेवा में समानता की लड़ाई है। सुनील पटेल ने नियमों और शासनादेशों को ताक पर रखकर अपनी मर्जी से नियुक्ति, बहाली और मानदेय पर नियंत्रण किया, जो घोर तानाशाही का प्रमाण है।
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