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सपा कार्यालय 'अंधेरे' में डूबा: संगठन के अंदर मचा घमासान, बदनामी की 'आंच' लखनऊ तक
उत्तर प्रदेश

सपा कार्यालय ‘अंधेरे’ में डूबा: संगठन के अंदर मचा घमासान, बदनामी की ‘आंच’ लखनऊ तक

विनोद कुमार मिश्रा ( सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश )

  • विनोद मिश्रा

बांदा। जिस समाजवादी पार्टी ने सत्ता में रहते “हर हाथ को रोशनी देने की बात” की थी, आज उसी पार्टी का “जिला कार्यालय अंधेरे में डूबा पड़ा” है। डेढ़ लाख रुपये का “बिजली बिल बकाया होने पर विभाग ने कनेक्शन काट” दिया। इसके साथ ही समाजवादी पार्टी की आंतरिक अव्यवस्था और नेतृत्व की लापरवाही की परतें खुलने लगी हैं !

सपा कार्यालय 'अंधेरे' में डूबा: संगठन के अंदर मचा घमासान, बदनामी की 'आंच' लखनऊ तक

बांदा में सपा की राजनीतिक पकड़ तो पुरानी है। यहां से सांसद कृष्णा देवी पटेल और विधायक विशंभर यादव संसद एवं विधान सभा में प्रतिनिधित्व करते हैं। यह राष्ट्रीय महासचिव विशंभर निषाद का भी गृह जनपद है। फिर भी पार्टी कार्यालय की ‘बिजली कट जाना’ न सिर्फ ‘आर्थिक दुर्दशा’ का प्रतीक है, बल्कि संगठनात्मक लापरवाही और संवादहीनता की भी गवाही देता है।

सपा कार्यालय 'अंधेरे' में डूबा: संगठन के अंदर मचा घमासान, बदनामी की'आंच' लखनऊ तक

पार्टी के विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो जिलाध्यक्ष मधुसूदन कुशवाहा को विधायक और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने बिजली बिल चुकाने के लिए चंदा दिया था,परंतु प्रश्न उठता है कि “जब पैसा दिया गया था, तो बिल जमा क्यों नहीं हुआ ? कौन जिम्मेदार है इस बदनामी के लिए ?” यह प्रश्न न सिर्फ कार्यकर्ताओं को ‘कचोट’ रहा है, बल्कि पूरे संगठन को सोशल मीडिया और विपक्षी टिप्पणियों के कटघरे में खड़ा कर रहा है।

सपा कार्यालय 'अंधेरे' में डूबा: संगठन के अंदर मचा घमासान, बदनामी की 'आंच' लखनऊ तक

सपा कार्यालय की बिजली कटौती की खबर सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी है। “मेमे, तंज और कटाक्षों की बाढ़” आ गई है। विरोधी पार्टियों के कार्यकर्ता “अंधेरे में विचारधारा”, “चंदे से चुप्पी” और “सत्ता से कट, बिजली से भी कट” जैसे जुमले उछाल रहे हैं !

सपा कार्यालय 'अंधेरे' में डूबा: संगठन के अंदर मचा घमासान, बदनामी की'आंच' लखनऊ तक

एक वरिष्ठ सपा कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा “जब जिलाध्यक्ष के पास बिल भरने की जवाबदेही नहीं, तो जनता के मुद्दे कैसे उठाएंगे ? यह सिर्फ बिजली नहीं, पार्टी की आंतरिक फूट और ढीलापन उजागर कर रहा है।” राजनीतिक जानकारों का कहना है कि “संगठन की रीढ़ कार्यालय” होता है। वहां “अंधेरा छा जाना सिर्फ एक तकनीकी गलती नहीं, बल्कि नेतृत्व की दिशाहीनता” का संकेत है। यह घटना राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की छवि पर भी बदनामी के छींटे डाल रही है। सवाल उठा रही है कि “क्या संगठन अब केवल नाम और चुनावी पोस्टरों तक सिमट गया है ?”

 

 

 

Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh

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