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बांदा में बसपा को 'विधान सभा' के लियें 'ढूंढे' नहीं मिल रहे 'प्रत्याशी' ? कहाँ 'चूकी' पार्टी ?
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बांदा में बसपा को ‘विधान सभा’ के लियें ‘ढूंढे’ नहीं मिल रहे ‘प्रत्याशी’ ? कहाँ ‘चूकी’ पार्टी ?

विनोद मिश्रा डायरेक्टर सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश

  • विनोद मिश्रा

बांदा। कभी जिले की सियासत में “कैडर की हुंकार” से गूंजने वाली “बसपा अब सन्नाटे” में है। विधान सभा चुनाव के लिये प्रत्याशी ‘ढ़ूँढ़े’ नहीं मिल रहे ? प्रश्न सीधा है की ‘संगठन कहां है ? नेता कहां गए ? और कार्यकर्ता किस भरोसे बैठा है’ ? जमीनी हकीकत और पार्टी से जुड़े सूत्रों की बातचीत के बाद चार बड़े सवाल सामने आ रहे हैं। बूथ और सेक्टर स्तर पर पार्टी का ढांचा लगभग खाली दिख रहा है। सदस्यता अभियान कागजों पर है, जमीन पर नहीं। जब कार्यकर्ता ही मैदान में नहीं होगा तो वोटर तक पैगाम कौन पहुंचाएगा? जिले के कई बूथों पर पिछले एक साल से कोई नियमित बैठक तक नहीं हुई।

बांदा में बसपा को 'विधान सभा' के लियें 'ढूंढे' नहीं मिल रहे 'प्रत्याशी' ? कहाँ 'चूकी' पार्टी ? जिन ‘चेहरों के नाम पर कभी वोट’ पड़ते थे, वह ‘आज समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम’ चुके हैं। पुराने कद्दावर नेताओं के पलायन से न सिर्फ जनाधार गया,बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूटा। बांदा-चित्रकूट क्षेत्र में लगातार चुनावी नतीजे पार्टी के खिलाफ रहे। नतीजों के बाद न समीक्षा हुई, न जिम्मेदारी तय हुई। नतीजा सामने है की कार्यकर्ता हताश और उनका मतदाता उदासीन। राजनीति में नतीजा ही कार्यकर्ता की ऊर्जा तय करता है।

बांदा में बसपा को 'विधान सभा' के लियें 'ढूंढे' नहीं मिल रहे 'प्रत्याशी' ? कहाँ 'चूकी' पार्टी ? आज की राजनीति सड़क और सोशल मीडिया दोनों पर “लड़ी” जाती है। लेकिन “यहां न सड़क पर आंदोलन दिख रहा है, न युवाओं से सीधा संवाद”। सदस्यता अभियान की “रफ्तार इतनी धीमी है कि नई पीढ़ी को पार्टी से जोड़ पाना मुश्किल” हो रहा है। इस दिशा में “बसपा जिलाध्यक्ष रामसेवक प्रजापति निष्क्रिय से साबित” हुये हैं ? इसके अलावा मंडल कोआर्डिनेटर बलदेव प्रसाद वर्मा बसपा से छिटका वोट बैंक पुनः पाले में ला पायेंगे “असंभव” सा माना जा रहा है ?

बांदा में बसपा को 'विधान सभा' के लियें 'ढूंढे' नहीं मिल रहे 'प्रत्याशी' ? कहाँ 'चूकी' पार्टी ? इस पार्टी में सिर्फ दो ही चेहरे बसपा को मजबूत करने के लिये परेशान दिखते हैं वह “पूर्व डीडीसी लल्लू राम निषाद एवं कोषाध्यक्ष कमला कांत त्रिवेदी”। लेकिन कथित रूप से संगठन का सक्रिय सहयोग न पाने के कारण सिर्फ “छाती पीटने की स्थिति में बचे” हैं। हालत यह बताया जा रहा है की विधान सभा 2027 के चुनाव के लिये सभी सीटों के लिये “प्रत्याशी ढ़ूँढ़े नहीं मिल” रहे ? इन राजनीतिक प्रभाव की स्थिति में क्या बसपा अपनी पुरानी “कैडर की ताकत” को वापस ला पाएगी? या बांदा में सिर्फ नाम की पार्टी बनकर रह जाएगी ? “क्योंकि राजनीति में जगह उसी की होती है जो मेहनत” करे।

 
 



Sharad Mishra [ Editor In Chief ] CITY NEWS Uttar Pradesh
 





 

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