
- विनोद मिश्रा
बांदा। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का ड्रीम प्रोजेक्ट ‘केन-बेतवा लिंक’ अब प्रभावितों के लिए ‘चिता परियोजना’ बन गया है ! पुनर्वास और मुआवजे के वादे टूटने से आक्रोशित लोगों ने मंगलवार को पन्ना जिले के कुपी गांव के पास बराना नदी के किनारे फिर से “न्याय दो या मार दो” के नारे के साथ अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू कर दिया।
अप्रैल में प्रशासन के आश्वासन पर टाला गया यह आंदोलन अब और धार के साथ लौटा है। इस बार आंदोलन की कमान आदिवासी महिलाओं ने संभाली है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि सरकार ने पुनर्वास, मुआवजे और पैकेज को लेकर एक भी वादा पूरा नहीं किया। उल्टे मानसून के बीच प्रशासन ने लोगों के घर ढहा दिए। नतीजा- सैकड़ों परिवार खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं।
आंदोलन की नेता दिव्या अहीरवार कहती हैं की अप्रैल में जो वादे किए गए थे,उनमें से एक भी नहीं निभाया। इस बार झूठे आश्वासन में नहीं आएंगे। सरकार न्याय नहीं दे सकती तो हमें इच्छा मृत्यु की अनुमति दे। प्रशासन की तानाशाही के कारण 50 हजार लोग बेघर हो गए हैं। लोग जल-जंगल-जमीन और अपनी संस्कृति से उजाड़ दिए गए हैं।
केन-बेतवा लिंक को पर्यावरण के लिए घातक बताते हुए कहा कि इस परियोजना से 46 लाख पेड़ कटेंगे, पन्ना टाइगर रिजर्व उजड़ेगा और केन नदी खत्म हो जाएगी। छतरपुर के गांव पलकोंहा और कुदन में बिना नोटिस घर तोड़े जा रहे हैं। अधिकांश परिवारों को न मकान का मुआवजा मिला है न पुनर्वास पैकेज। अमित भटनागर ने कहा “या तो हमें न्याय दो, या मार दो। केन-बेतवा को “विकास की गंगा” कहकर शुरू की गई यह योजना अब बुंदेलखंड में “विनाश की चिता” के रूप में देखी जा रही है।
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