
- विनोद मिश्रा
बांदा। आंकड़ों की अजब-गजब बाजीगिरी का आलम यह रहा की जल संरक्षण और भूगर्भ जलस्तर बढ़ाने के नाम पर जिले को राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल हुआ। ग्रामीण इलाकों में तालाब योजना ढेर है वहीं शहर के तालाबों की सुधि लेने वाला कोई नहीं है। जिला मुख्यालय की बात करें तों 50 से ज्यादा तालाबों का अस्तित्व पूरी तरह मिट गया है। जबकि तमाम तालाबों पर अवैध कब्जे हैं। सेढ़ू तलैया, डिग्गी और परशुराम तालाब पर मोहल्ले बस गये हैं। बड़े-बड़े मकान बन गए हैं। पालिका में वर्तमान में भी 64 से ज्यादा तालाब दर्ज हैं।

चार दशक पहले तक शहर में 100 से ज्यादा तालाब थे। धीरे-धीरे इन पर भूमाफिया की लार टपक पड़ी। कब्जे की होड़ लग गई। शहर के ज्यादातर तालाब पाटकर प्लाटिंग कर दी गई। भवन बन गये। जिम्मेदार प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। लगभग एक दशक से शहरीकरण में तेजी आई और भूमाफिया के निशाने पर बचे-खुचे तालाब आ गये ।

नगर पालिका के आंकड़ों में डिग्गी तालाब करीब चार हेक्टेयर दर्ज है, जबकि वहां तालाब का नामोनिशान नहीं है। कुछ हिस्से में रेलवे विभाग आबाद हो गया तो कुछ में शहरवासी काबिज हैं। इसी तरह परशुराम तालाब कागजों में करीब छह हेक्टेयर है, लेकिन अब यहां तालाब का नामोनिशान नहीं है। मोहल्ला जरूर परशुराम तालाब के नाम से जाना जाता है। यहां के तालाब भवनधारी बन गये हैं।
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