- विनोद मिश्रा
चित्रकूट। राष्ट्रीय रामायण मेला के कार्यकारी अध्यक्ष प्रशांत करवरिया की प्रबल इच्छा है की राष्ट्रीय रामायण मेला का स्वरूप अंतर्राष्ट्रीय हो। इसके लिये प्रदेश और केंद्र सरकार से वार्ता कर इस दिशा में ध्यान आकृष्ट करायेगें। प्रशांत करवरिया कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद हमसे एक अनौपचारिक भेंट में वार्ता कर रहे थे।

कहा कि चित्रकूट धर्म अध्यात्म और संस्कृति की भूमि है। चित्रकूट देश के साथ समूचे विश्व को संस्कृति का ज्ञान कराता है।ऐसे में यहां आयोजित राष्ट्रीय रामायण मेला को अंतर्राष्टीय मानचित्र में दर्जा दिलाना भी समायानुसार जरूरी है। अपनी वार्ता को आध्यात्मिक दिशा देते हुये प्रशांत करबरिया नें कहा की श्रीराम अयोध्या में राजा थे। राम को चित्रकूट ने ही मर्यादा पुरूषोत्तम बनाया है।

यहां की भूमि से त्याग पैदा होता है जिसका प्रमाण राम और भरत के मिलन के समय अयोध्या जैसे साम्राज्य की राजगद्दी राम भरत की ओर से ठुकराना था। रामायण एक ऐसा ग्रन्थ है जो प्रत्येक वर्ग व जाति के लोगों को पारिवारिक, सामाजिक व सत्ताधारियों को देश चलाने के क्रियाकलापों का ज्ञान कराता है।
यह पूछे जाने पर की युवा अवस्था में आपने राष्ट्रीय रामायण मेला का बहुत बड़ा दायित्व संभाला है। इसे अंतररार्ष्टीय स्वरूप दिलाने के लिये काफी कठिन संघर्ष की जरूरत होगी। प्रशांत करवरिया नें बिहारी के दोहे से अपनी बात यह कहकर समाप्त किया की “सतसैया के दोहरे ज्यों नाविक के तीर, देखन में छोटे लगे घाव करें गंभीर”।
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