- विनोद मिश्रा
बांदा। जिला मुख्यालय में स्थापित प्राचीन बामदेवेश्वर मंदिर बुंदेलखंड में आस्था का केंद्र बिंदु है। पौराणिक मान्यताओं की मानें तो पहाड़ की गुफाओं में विराजमान शिवलिंग को स्थापित नहीं किया गया, बल्कि महर्षि बामदेव के तपस्या के बाद यहां स्वयं शिवलिंग प्रकट हुआ था। इसी पर्वत में सर्पों का भी वास है। दर्शनार्थियों के बाद शिवलिंग का दर्शन करने सांप भी आते हैं। श्रावण मास भगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे उत्तम माह माना जाता है। इसी वजह से इस मंदिर में श्रावण मास में शिव भक्तों का सैलाब है।

मंदिर के पुजारी महाराज पुत्तन तिवारी बताते हैं कि महर्षि बामदेव का तपस्या स्थल बांबेश्वर पर्वत था। महर्षि की तपस्या से गुफा के अंदर शिवलिंग स्थापित हुए, यह शिवलिंग 12 ज्योतिर्लिंगों से भी प्राचीन है। पहले यह गुफा इतनी नीची थी कि लोगों को लेटकर दर्शन के लिए जाना पड़ता था। लेकिन धीरे-धीरे कर गुफा ऊंची होती चली गई और अब लोग दर्शन के लिए खड़े होकर प्रवेश कर जाते हैं। पुजारी जी कहते हैं कि प्रतिवर्ष एक जौ गुफा की ऊंची होने की किवदंती है।

ऋषि बाम देव गौतम ऋषि के पुत्र थे। उन्हें गौतम भी कहते हैं। वेदों के अनुसार सप्तऋषियों में ऋषि बामदेव का नाम भी आता है और उन्होंने संगीत की रचना की थी। रामायण काल में इस बामदेवेश्वर पर्वत पर वह निवास करते थे। इसी पर्वत पर स्थित भगवान शिव का मंदिर उन्होंने स्थापित किया था और बांदा नाम भी उन्हीं के नाम पर पड़ा है। धर्मशास्त्रों के मुताबिक,भगवान राम ने यहां आकर शिव की आराधना की थी।
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