- विनोद मिश्रा
बांदा। “किसान आसमां से गिरकर खजूर में अटका सिसक” रहा है। “डीएपी खाद की आफत” झेलने के बाद अब “यूरिया किसानों से गले मिलन” नहीं कर रही है। मंडल में डीएपी के बाद अब यूरिया के लिये किसान “आ गले लग जा” की “मोहबब्त के लिये तरस” रहा है। लेकिन यूरिया “बेवफाई की डगर” पर है।

किसानों की हालत यह है कि वह टोकन के लिए सुबह तीन बजे से लाइन में लग जातें हैं। बावजूद खाद नसीब नहीं होती। किसान गेहूं में यूरिया का छिड़काव नहीं कर पा रहा है। यूरिया न मिलने से किसानों को फसल के बर्बाद होने का डर नींद उड़ाये है।

चित्रकूटधाम मंडल में इस वर्ष 9 लाख हेक्टेअर से अधिक क्षेत्र में रबी की बुआई की गई है। पहले किसान बुवाई के लिए डीएपी को परेशान रहा। अब गेहूं की फसल में यूरिया के छिड़काव के लिए परेशान हैं। उन्हें सहकारी समितियों में यूरिया नहीं मिल पा रही है। समितियों में एक-एक बोरी यूरिया के लिए मारामारी मची है।

मंडल में रबी अभियान के तहत यूरिया का लक्ष्य 49,559 मीट्रिक टन है। इसके सापेक्ष अभी तक महज 24,900 मीट्रिक टन ही यूरिया का वितरण किया गया है। मंडल के बफर गोदामों में यूरिया का महज 1670 एमटी स्टाक है। समितियों को मांग की आधी भी यूरिया नहीं मिल पा रही है। ऐसे में ज्यादातर समितियों में यूरिया नहीं है। कुछ में है तो वह किसानों को एक या दो बोरी ही यूरिया दे रहे हैं। जब कि किसानों का कहना है कि उन्हें रकबे के हिसाब से यूरिया मिलना चाहिए। ताकि फसलों के “अच्छे दिन” आ सकें।
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