- विनोद मिश्रा
बांदा। डाक्टरों का अभाव,जांच की मशीनें हो रही कबाड़ और आक्सीजन बेचारा लाचार। सारी महंगी जांचे बाहर से,ऐसे में मरीजों की हालत बदहाल हैं। नये डिप्टी सीएम स्वास्थ मंत्री बृजेश पाठक से समस्या के समाधान की दरकार हैं।

कोरोना महामारी की दूसरी लहर में सांस पर संकट हुआ तो सरकार ने ऑक्सीजन उत्पादन प्लांटों पर बाहुबली बनी। मंडल मुख्यालय के रानी दुर्गावती राजकीय मेडिकल कालेज और मंडलीय अस्पताल को पांच ऑक्सीजन प्लांट मिले, पर सबसे बड़ी डाक्टरों की कमी की समस्या दूर नहीं हुई।

मेडिकल कालेज चिकित्सा शिक्षक/डाक्टरों के 51 पद खाली हैं। मनोरोग विभाग में कोई डाक्टर नहीं है। जिला अस्पताल और ट्रामा सेंटर में चिकित्साधिकारियों के 10 पद रिक्त हैं। अल्ट्रा साउंड ,सिटी स्केन की मशीनें उपलब्ध पर जांच कार्य ठप। अन्य महंगी सारी जांचे बाहर से कराने को लिखी जाती हैँ। यह व्यवस्था तंत्र का कौन सा है कमाल ! कोरोना महामारी के बाद केंद्र और राज्य सरकार ने स्वास्थ्य सेवाएं बढ़ाने पर ध्यान दिया, तो साथ ही बेडों की संख्या भी बढ़ी। पूर्व में गिने-चुने वेंटीलेटर होते थे। मेडिकल कालेज में 130 और जिला अस्पताल में लगभग 25 वेंटीलेटर हो गए।

सरकारों ने ऑक्सीजन संकट की समस्या तो दूर कर दी, पर डाक्टरों की कमी दूर नहीं हो सकी। तमाम विशेषज्ञों के पद खाली हैं।मरीजों का आरोप है की डाक्टरों के पास दलालों का डेरा है। कमीशन के नृत्य का बोलबाला है। मरीजों को दूसरे जनपदों में जाकर इलाज कराना मजबूरी है।
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