- विनोद मिश्रा
बांदा। रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद के दिन दशहत से भरे थे। मन में आशंका थी कि वतन की वापसी होगी भी या नहीं। लेकिन, जैसे ही सुना कि शहर से निकलकर सीमा पर जाना है तो हम सभी साथी चल दिए। रास्ते में डर भी लग रहा था। मगर तिरंगे की सुरक्षा से सीमा पर पहुंचे और आज अपने वतन आकर घर वालों से मिल सके। ये कहना है यूक्रेन से लौटे बबेरू निवासी एमबीबीएस के छात्र आलोक चंद्र का। आलोक ने बताया कि तिरंगा लेकर चलने के दौरान रूसी सेना कुछ नहीं बोलती थी। सभी सम्मान देते थे। यह जरूर है कि दहशत के बीच उन लोगों ने दिन काटे हैं।

तहसील मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम पंचायत समगरा का मजरा राम प्रसाद कोटेदार का डेरा है। यहां के निवासी जयरूप निषाद पूर्व माध्यमिक विद्यालय समगरा में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। उनका 22 वर्षीय बेटा आलोक चंद्र यूक्रेन के शहर इवानो के फ्रांकीप मेडिकल कालेज में सन- 2019 में एमबीबीएस की पढ़ाई करने गया था। आलोक ने बताया कि यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध शुरू होते ही कक्षाएं बंद कर आनलाइन पढ़ाई शुरू कर दी गई थी। युद्ध तेज हुआ तो हम लोगों ने वहां से निकलने के प्रयास शुरू कर दिए।
– बाहर निकलने में लगता था डर, दस किमी चले पैदल
आलोक के मुताबिक घर से बाहर निकलने पर डर लग रहा था। इसी बीच कालेज प्रशासन के अलावा भारत के दूतावास से संपर्क किया । 26 फरवरी की सुबह एक प्राइवेट बस से रोमानिया बार्डर पर दिन के चार बजे पहुंचे। भूखे प्यासे करीब 10 किलोमीटर पैदल भी चलना पड़ा। रोमानिया सीमा के बाद एयरपोर्ट तक पहुंचे।

– मोबाइल फोन पर परिवार से बनाए रखा संपर्क
युद्ध के समय माता-पिता व परिवार के लोग परेशान थे। हम लगातार मोबाइल फोन पर उनके संपर्क में थे। भारत सरकार भी अपने सभी भारतीयों को अपने देश लाने के लिए पूरी तरह प्रयासरत है। बताया कि मंगलवार की रात्रि करीब ढाई बजे दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे। दिल्ली एयरपोर्ट से हमें एयरपोर्ट से यूपी भवन लाया गया। वहां पर नाश्ता और भोजन कराने के बाद सरकार ने अपने निजी वाहन से गांव वापस भेजा है।
– सुरक्षा कवच बना भारतीय ध्वज
आलोक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देते थक नहीं रहे थे। बताया कि भारत मां का तिरंगा झंडा लेकर निकलने पर कोई भी बोलता नहीं था । बल्कि सम्मान देते थे। सरकार ने अपने खर्च पर उसे घर तक पहुंचाया है। बम के धमाकों और उड़ते फाइटर प्लेन सांस अटका देते थे। छात्र आलोक चंद्र ने बताया कि इवानो फ्रांकीप शहर से 26 फरवरी की सुबह प्राइवेट बस से चले। शाम चार बजे रोमानिया बार्डर पहुंचे और बस का किराया 18 सौ रुपये लगा। फ्रांकीप शहर में माइकल नामक व्यक्ति के यहां सात हजार रुपये मासिक किराये पर तीन लोग रहते थे। बिजली, गैस, पानी का बिल अलग से लगता था।
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