- विनोद मिश्रा
बांदा। चित्रकूट मंडल में पिछले तीन दशकों से ‘लाल सलाम’ पर विराम लगा गया! वह भी ऐसा जो सिसकता रहा पर उठ नहीं सका। आज भी कौमे में हैं। करीब ढाई दशकों तक इस पथरीली और पाठा की धरती में लाल परचम खूब लहराया। 1967 से 1989 तक यह चटियल इलाका वामपंथी दलों का गढ़ रहा। 1989 के बाद उल्टी गिनती शुरू हो गई। मंडल में 1991 में कम्युनिस्ट पार्टी का आखिरी विधायक चुना गया। तब से आज तक यह वामपंथी विधान सभा चुनाव में जमानत बचाने के भी वोट हासिल नहीं कर पा रहे।

एक जमाना था जब चित्रकूटधाम मंडल के चारों जनपदों में लाल परचम का सिक्का जमा था। बुंदेलखंड के अन्य जनपदों सहित कानपुर में भी कम्युनिस्ट पार्टी किला फतह करती रही। बुंदेलखंड में कम्युनिस्ट पार्टी के पुरोधा दुर्जन भाई रहे। उनकी अगुवाई में चारों जिलों में बार-बार लाल परचम लहराया।वह खुद भी कई बार चुनाव लड़े और विधायक बनें।

1970 के दशक में दुर्जन भाई कम्युनिस्ट के भीष्म पितामह कहे जाते थे। इसी दौरान कम्युनिस्ट पार्टी लगातार हर चुनाव में अपनी जीत और जलवा बरकरार रखे रही। वामपंथी दलों के अच्छे दिन 1989 तक रहे। इस साल न सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी से सांसद रामसजीवन जीते बल्कि नरैनी से डा.सुरेंद्र पाल वर्मा और कर्वी से राम प्रसाद ने लाल परचम तले जीत हासिल की।

इसी चुनाव में कांग्रेस और भाकपा के गठबंधन प्रत्याशी के रूप में देव कुमार यादव बबेरू से जीते। तीन विधायक और एक सांसद के साथ सारे दलों को पीछे छोड़ने वाले वामपंथी इसके बाद हांसिए पर आना शुरू हो गए। 1991 में कर्वी से मात्र राम प्रसाद विधान सभा चुनाव जीते। हालांकि अन्य सीटों में कम्युनिस्ट पार्टी दूसरे नंबर पर रही।

( शरद मिश्रा- संपादक )
( सिटी न्यूज़ उत्तर प्रदेश )
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