
- विनोद मिश्रा
चित्रकूट। चित्रकूट की पावन धरा एक बार फिर ‘राम नाम’ की अनुगूंज से गूंज उठी। 53वें राष्ट्रीय रामायण मेला महोत्सव का शुभारंभ ऐसा “भव्य और दिव्य” रहा कि मानो “स्वयं त्रेता युग” की स्मृतियाँ “जीवंत” हो उठी हों। दीपों की ज्योति, वैदिक मंत्रोच्चार और संतों की उपस्थिति ने वातावरण को पूर्णतः राममय कर दिया।

दीप प्रज्वलन कर महोत्सव का शुभारंभ जगद्गुरु राघवाचार्य जी महाराज, उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अजीत कुमार और जल शक्ति राज्य मंत्री रामकेश निषाद ने किया। उद्घाटन सत्र में जगद्गुरु राघवाचार्य जी महाराज ने ओजस्वी उद्बोधन में कहा कि रामचरितमानस केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए जीवन का मार्गदर्शक है।

उन्होंने इसे राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किए जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि मानस में निहित आदर्श और मर्यादाएं आज भी समाज को दिशा देने में सक्षम हैं। उनकी वाणी में आस्था का प्रवाह था और संदेश में संस्कृति की गरिमा।

न्यायमूर्ति अजीत कुमार ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने स्पष्ट संदेश दिया है जो जिस कर्म में लगा है, यदि वह उसमें सत्य का पालन करे, तो वही उसकी सच्ची ईश्वर आराधना है। उन्होंने रामायण को नैतिक मूल्यों और न्याय की सर्वोच्च पाठशाला बताया।

राज्य मंत्री रामकेश निषाद ने कहा कि यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की वैश्विक पहचान है। उन्होंने कहा कि रामायण का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हो चुका है और जहां-जहां भारतीय संस्कृति का सम्मान है, वहां रामायण का आदर भी है। उन्होंने कहा कि चित्रकूट की धरती सदैव से तप, त्याग और मर्यादा की प्रतीक रही है।

महोत्सव में देशभर से आए संत-महात्माओं, विद्वानों और कलाकारों का सम्मान किया गया। कार्यकारी अध्यक्ष प्रशांत करवरिया, महामंत्री करूणा शंकर द्विवेदी और स्वागताध्यक्ष पूर्व सांसद भैरो प्रसाद मिश्र, राजा बाबू पांडे, प्रदुम्म दुबे लालू ने अतिथियों को अंगवस्त्र, श्रीफल और माल्यार्पण कर सम्मानित किया।

चित्रकूट परिक्षेत्र के विभिन्न अखाड़ों के संत-महंत बैंड-बाजों और अपने-अपने निशानों के साथ शोभायात्रा में शामिल हुए। उनके निशानों की विधिवत पूजा ने आयोजन को और भी दिव्य बना दिया। विद्वत गोष्ठियों में रामायण के गूढ़ रहस्यों पर मंथन हुआ तो सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भक्ति, संगीत और नृत्य की ऐसी छटा बिखरी कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो उठे। देर रात तक चलता रहा यह आध्यात्मिक उत्सव आस्था का महासंगम बन गया।
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