
- विनोद मिश्रा
बांदा। ऐतिहासिक राइफल क्लब मैदान की “नीलामी” प्रक्रिया नें “राजनीति में ऐसा भूचाल” ला दिया है कि अब “सत्ता पक्ष खुद अपने ही फैसलों से कटघरे” में खड़ा नजर आ रहा है ! विकास प्राधिकरण 21 जनवरी को “प्रस्तावित नीलामी” के लिये “नोटिफिकेशन” प्रकाशित करा चुकी है।

इसके बावजूद “भाजपा जिलाध्यक्ष कल्लू सिंह राजपूत ने राष्ट्रीय टीवी चैनल की डिबेट में दावा” कर दिया कि “नीलामी हो ही नहीं रही, विपक्ष बेवजह राजनीति कर रहा है।” लेकिन जब एंकर और विपक्ष ने नोटिफिकेशन का हवाला दिया, तो “जिलाध्यक्ष की अनभिज्ञता सार्वजनिक मंच पर उजागर” हो गई। बहस के दौरान उनकी स्थिति “ऐसी दिखी मानो सत्ता को खुद अपने फैसलों की जानकारी” नहीं है। उनके इस बयान ने “न केवल प्रशासन बल्कि सियासी गलियारों में भी हलचल” मचा दी है।

नोटिस सामने आते ही विपक्षी दल खेल संगठनों ने इसे शहर के खेल भविष्य पर हमला करार देते हुए आंदोलित हैं। आरोप है कि खेल के मैदान को बेचकर शहर की पहचान मिटाने की तैयारी है। मामला तब और विस्फोटक हो गया जब भाजपा जिलाध्यक्ष कल्लू सिंह राजपूत ने सार्वजनिक रूप से ऐलान किया कि नीलामी किसी भी कीमत पर नहीं होने देंगे। सत्ताधारी दल के जिलाध्यक्ष का ही अपने प्रशासनिक तंत्र के खिलाफ खड़ा होना,सरकार और संगठन दोनों के लिए असहज स्थिति बन गया है।

दरअसल मामला उस समय और राष्ट्रीय सुर्खियां बन गया जब एक बड़े टीवी न्यूज़ चैनल पर इस मुद्दे पर तीखी बहस हुई। पैनल में भाजपा जिलाध्यक्ष कल्लू सिंह राजपूत के साथ कांग्रेस जिलाध्यक्ष राजेश दीक्षित, कांग्रेस नेता संकटा प्रसाद त्रिपाठी और सपा नेता व पूर्व पालिका अध्यक्ष मोहन साहू मौजूद थे। डिबेट के दौरान एंकर के सवालों पर भाजपा जिलाध्यक्ष ने कहा कि राइफल क्लब की नीलामी हो ही नहीं रही। लेकिन जैसे ही विपक्ष ने सरकारी नोटिफिकेशन का जिक्र किया, जिलाध्यक्ष की स्थिति डगमगाती नजर आई। नोटिफिकेशन जारी होने की “जानकारी” से उनकी “अनभिज्ञता” ने बहस को और “तीखा” बना दिया।

डिबेट में घिरने के बाद भाजपा जिलाध्यक्ष ने रुख बदलते हुए जोरदार लहजे में कहा “किसी भी हाल में राइफल क्लब मैदान नीलाम नहीं होने दूंगा।” यह बयान “आग में घी” का “काम” कर गया। भाजपा जिलाध्यक्ष की इस घोषणा पर विपक्ष ने अप्रत्याशित हमला और समर्थन दोनों किया। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी नेताओं ने कहा “अगर कल्लू सिंह राजपूत अपने शब्दों पर खरे उतरते हैं और नीलामी रुकवा देते हैं, तो विपक्षी दल, खिलाड़ी और जनता मिलकर उनका सार्वजनिक अभिनंदन करेंगे।”

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अगर नीलामी नहीं रुकती, तो क्या यह भाजपा संगठन की सबसे बड़ी नैतिक हार मानी जाएगी ? अब बांदा की राजनीति की सुई 21 जनवरी पर आकर “टिक” गई है। या तो नीलामी रुकेगी और भाजपा जिलाध्यक्ष ‘जनता के नायक’ बनेंगे, या फिर यह मामला सत्ता, संगठन और प्रशासन के बीच सबसे बड़ा सियासी टकराव साबित होगा।
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