
- विनोद मिश्रा
बांदा। कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय एक बड़े विवाद में फंस गया है। प्रतिभाशाली शोधार्थी और विश्वविद्यालय छात्र परिषद के अध्यक्ष कल्याण सिंह के साथ उनके ही विभागाध्यक्ष प्रो.अजीत सिंह पर नियम विरुद्ध विभागीय शोध समिति बनाकर भेदभाव व मानसिक शोषण का गंभीर आरोप लगा है। मामला मुख्यमंत्री तक पहुँचने के बाद अब प्रमुख सचिव कृषि एवं अनुसंधान रविन्द्र कुमार के पास जांच की जिम्मेदारी है। उन्होंने इस पूरे प्रकरण में कुलसचिव से 15 कार्य दिवस में आख्या तलब की है। सूत्र बताते हैं कि आदेश के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन में हड़कंप मच गया है और कुलसचिव की नींद उड़ चुकी है।

छात्र शिकायत निवारण समिति के अध्यक्ष कुलसचिव प्रो. सुरेन्द्र कुमार सिंह ने शुरुआत में मामले को दबाने की कोशिश की। जब कुलाधिपति (राज्यपाल) के संज्ञान में प्रकरण पहुँचा,तभी तत्काल जांच के आदेश दिए गए। लेकिन जांच की आड़ में कुलसचिव ने कथित रूप से एकतरफा सुनवाई की। आरोपी विभागाध्यक्ष को नोटिस तक नहीं भेजा गया। बिना उनका पक्ष सुने सुनवाई निपटा दी गई। उल्टे शोधार्थी कल्याण सिंह पर ही विश्वविद्यालय की छवि धूमिल करने का आरोप लगा दिया गया। न्याय से वंचित होकर शोधार्थी ने विश्वविद्यालय के लोकपाल प्रो. हरनाम सिंह के यहां अपील की, लेकिन 30 दिन में भी सुनवाई तय नहीं हुई। यही नहीं विश्वविद्यालय वेबसाइट पर लोकपाल का पता और ईमेल जानबूझकर अपलोड नहीं किया गया।

प्रशासनिक भवन में लोकपाल का कोई दफ्तर ही मौजूद नहीं है। कल्याण सिंह का आरोप है कि यह सब कुलसचिव की मिलीभगत से किया गया, ताकि मामला दबाया जा सके। जब शिकायत सीधे राजभवन (कुलाधिपति) तक पहुँची, तब कुलसचिव ने तुरंत नोटिस निकालकर 8 अक्टूबर को सुनवाई तय कर दी। हैरानी की बात यह है कि अब आरोपी विभागाध्यक्ष प्रो.अजीत सिंह को नोटिस जारी किया गया है। मुद्दा यह है जब पहले सुनवाई हुई थी, तब आरोपी को क्यों नहीं बुलाया गया? बिना उनका पक्ष सुने, मामला निस्तारित कैसे दिखा दिया गया ? शोधार्थी कल्याण सिंह ने साफ कहा कुलसचिव इस पूरे खेल में शामिल हैं। जांच के नाम पर लीपापोती कर विभागाध्यक्ष को बचा रहे हैं !”

इधर, शोधार्थी के पिता और वरिष्ठ भाजपा नेता रमेश कुमार सिंह ने भी मोर्चा खोल दिया है। उनका कहना है “कुलसचिव ने मेरे पत्र का कोई जवाब नहीं दिया। अब मैं खुद मुख्यमंत्री से मिलकर इस प्रकरण में विधिक कार्रवाई की मांग करूंगा।” विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, हाल ही में प्रमुख सचिव कृषि एवं अनुसंधान ने विश्वविद्यालय के क्रियाकलापों पर गहरी नाराजगी जताई थी और एक निदेशक को कड़ी फटकार भी लगाई थी। अब यह मामला उनके पास है और उन्होंने सीधे कुलसचिव से जवाब माँगकर संकेत साफ कर दिए हैं कि लीपापोती का खेल ज्यादा दिन नहीं चल पाएगा।
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