
- शरद मिश्रा
बांदा। आसमान से बरसता पानी अमीरों के लिए सावन का एहसास है,तो बांदा के गरीबों के लिए आफत का सैलाब बन गया है। जिले में लगातार हो रही बारिश अब गरीबों के आशियाने निगल रही है, उनकी वर्षों की ‘गाढ़ी कमाई’ से बनी ‘झोपड़ी को निगल’ रही है। दर्दनाक तस्वीर अतर्रा तहसील के बरछा बुजुर्ग के शांति नगर से सामने आई है, जहां तीन बेसहारा महिलाओं की दुनिया उजड़ गई। रात-दिन की मजदूरी से जो चार दीवारें खड़ी की थीं, वो पल भर में मलबे का ढेर बन गईं।
शांति नगर निवासी प्रेमा पत्नी स्व.श्रीपाल की ‘आंखों में आंसू और गोद में बिखरा सामान’ है। पति को खो चुकी प्रेमा का ‘कच्चा मकान भरभराकर गिर पड़ा’। छत गिरी तो साथ में बर्तन, कपड़े, अनाज सब मिट्टी में मिल गया। आज प्रेमा के पास न छत है, न चूल्हा जलाने की जगह। वो खुले आसमान के नीचे अपने बच्चों के साथ बारिश से बचने के लिए पन्नी टांगे बैठी है। वहीं पड़ोस की शिवलाली पत्नी संजय और राजवंती पत्नी मनीराम की कहानी भी जुदा नहीं है।
उनकी दीवारें ‘ढह’ गईं, घर में ‘पानी भर’ गया और ‘गृहस्थी कीचड़ में सन’ गई। तीनों विधवा, गरीब, मजदूर महिलाएं अब प्रशासन की ओर ‘टकटकी’ लगाए ‘बैठी’ हैं। पीड़ितों ने रोते हुए उपजिलाधिकारी अतर्रा को प्रार्थना पत्र देकर सिर्फ इतना मांगा है की “साहब, हमारा घर देख लो, हमें कहीं छत दिला दो”। उधर राजस्व निरीक्षक प्रिंस शुक्ला ने बताया कि मौके का निरीक्षण कर रिपोर्ट भेज दी गई है, लेकिन विचारणीय यह है कि रिपोर्ट फाइलों में दबने से पहले इन तीन माताओं को मुआवजे की छत नसीब होगी क्या ?
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