
- विनोद मिश्रा
बांदा। राजनीति में विरासत और पैसा बोलता है, लेकिन बबेरू ने एक ऐसा नाम चुना जिसकी पूंजी सिर्फ “संघर्ष” और “सेवा” है। वो नाम है सपा के तीन बार “विधायक विशंभर सिंह यादव”। इनका सियासी सफर “छात्र राजनीति” से शुरू हुआ। आपातकाल के काले दौर में लोकतंत्र बचाने की “लड़ाई लड़ी तो जेल” भी गए।
उस वक्त न कोई सिफारिश थी,न कोई राजनीतिक घराना। सिर्फ जनता के लिए लड़ने का जज्बा था। बिना धनबल, बिना नफरत की राजनीति के उन्होंने बबेरू की “गली-गली” में अपनी “पहचा”न बनाई। हर दुख-सुख में जनता के साथ खड़े रहे। नतीजा ये हुआ कि जनता ने उन्हें तीन बार बबेरू विधानसभा से “विधायक बनाकर सदन” भेजा।
सियासी जानकार कहते हैं कि आज के दौर में जब टिकट के लिए करोड़ों का खेल होता है, तब विशंभर यादव ने साबित किया कि “जनता का विश्वास” सबसे बड़ा चुनाव चिन्ह है। आज भी विधायक विशंभर यादव जमीन से जुड़े हैं। शिक्षा, युवाओं के रोजगार और सामाजिक सद्भाव उनके एजेंडे में सबसे ऊपर हैं। सादगी और संघर्ष की वजह से ही पूरे क्षेत्र में उन्हें “बबेरू का जननायक” कहा जाता है।
बबेरू की जनता का एक ही कहना है “विशंभर जी चुनाव जीतकर विधायक नहीं बने, जनता ने उन्हें अपना बेटा बनाकर विधायक बनाया।” संघर्ष से शिखर तक का ये सफर हर उस युवा के लिए प्रेरणा है जो राजनीति में ईमानदारी से आना चाहता है।
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