
- विनोद मिश्रा
बांदा। बुंदेलखंड का अभागा जिला बांदा आज अपनी लाशों पर सियासत देख रहा है। यहां बेरोजगारी पेट काट रही है, कर्ज का मर्ज मौत बनकर गले लग रहा है और पलायन ही किस्मत बन गया है !
साल भर पहले पिपरहरी निवासी गनेश द्विवेदी ने बेटे को रोजगार देने के लिए मुख्यमंत्री उद्यमी योजना से 5 लाख का लोन लिया। खेती के लिए ट्रैक्टर भी कर्ज पर खरीदा। सोचा था किस्त भर देंगे। लेकिन न काम चला, न फसल हुई। हर महीने बैंक का तगादा। आखिरकार गनेश ने जहर खा लिया।
यह अकेली मौत नहीं है। बिसंडा के तेंदुरा और भरसोपुरवा में लॉकडाउन के बाद लौटे मजदूरों के पास गांव में काम नहीं था। न काम,न खाना। कई नें अवसाद में आहुति दे दी ? यह सरकारी सिस्टम की नाकामी की मोतें हैं ? नरैनी के चौकिन पुरवा में 200 मजदूर परिवार रहते हैं। सबके पास मनरेगा जॉब कार्ड है,पर काम नहीं। साल में 20 दिन भी रोजगार नहीं मिलता। मजबूरी में पूरे परिवार को हरियाणा-दिल्ली की ईंट भट्टों पर जाना पड़ता है। वहां ठेकेदार मजदूरी मार लेते हैं। भूखे पेट बंधुआ मजदूरी करनी पड़ती है। बच्चे स्कूल छोड़कर ईंट ढोते हैं। लौटो तो राशन कार्ड से नाम कटा मिलता है।
मनरेगा कहां है ? बजट हर साल आता है, पर गांवों में 6 महीने काम बंद क्यों रहता है? जॉब कार्ड सिर्फ दिखावा है क्या? लोन की गारंटी, रोजगार की गारंटी कहां? लोन दे दिया, पर बाजार कौन देगा ? ईएमआई न भरने पर किसान मरे तो जिम्मेदार कौन? मशीनीकरण के बाद मजदूर कहां जाए? ट्रैक्टर आ गए, पर भूमिहीन की मजदूरी कौन देगा? पुलिस कहती है “घरेलू कलह”, कागज कहते हैं “आत्महत्या” ! लेकिन बांदा का हर गांव जानता है यह मौतें सरकारी वादों की हैं। बुंदेलखंड पैकेज आए, योजनाएं बनीं, पर आज भी यहां रोटी के लिए पलायन और कर्ज के लिए मौत तय है। जब तक गांव में काम और खेत में फायदा नहीं होगा, तब तक बांदा की ये “अर्थी यात्रा” रुकने वाली नहीं है?
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