
- विनोद मिश्रा
बांदा। बुंदेलखंड में मानसून की बेरुखी ने एक बार फिर सूखे की आशंका गहरा दी है। कमजोर बारिश ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। खेतों में दरारें पड़ने लगी हैं और तालाब-खेत सूखे पड़े हैं। हालात देखकर किसान दहशत में हैं कि कहीं फिर से सूखे के काले दिन न लौट आएं। बुंदेलखंड का सूखे से पुराना नाता है। सरकार ने कई बार प्लान बनाए, लेकिन लापरवाही और देखरेख के अभाव में हर योजना फेल हो गई। इस बार भी दूसरे इलाकों की तुलना में यहां बारिश का ग्राफ बेहद कमजोर है। पानी के लिए लोग दर-दर भटकने को मजबूर हैं। खेती-बाड़ी भगवान भरोसे है।
सिंचाई संकट दूर करने के लिए एक दशक पहले ‘खेत तालाब योजना’ शुरू हुई थी। हजारों तालाब खुदे, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। हमारी पड़ताल में ज्यादातर तालाब सूखे मिले। यह तालाब सिर्फ बारिश में भरते हैं और एक सिंचाई में ही खाली हो जाते हैं। साल भर किसानों को इनका कोई लाभ नहीं मिल पाता। वैकल्पिक जलभराव की कोई व्यवस्था न होने से योजना सिर्फ कागजी साबित हो रही है। किसानों का कहना है कि सिंचाई के अभाव में पैदावार लगातार गिर रही है। लागत निकालना तो दूर, साल भर का अनाज भी नहीं उपज पा रहा। इसका सीधा असर परिवार के भरण-पोषण पर पड़ रहा है। हालात ऐसे कि पेट पालने के लिए किसानों को बुंदेलखंड छोड़कर दूसरे शहरों का रुख करना पड़ रहा है।
प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह के मुताबिक ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना’ से उम्मीद है, लेकिन निर्माणाधीन होने से फिलहाल कोई राहत नहीं। बुंदेलखंड की छोटी नदियां, पुराने तालाब और नहरें पुनर्जीवित किए बिना संकट टलना मुश्किल है। वह जल संरक्षण पर जोर देते हैं। उप कृषि निदेशक डॉ. अभय कुमार सिंह यादव भी मानते हैं कि खेत तालाब सिर्फ बरसात में भरते हैं। तालाबों को भरने की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है। किसानों को दो किस्तों में आर्थिक मदद दी जाती है, लेकिन पानी नहीं तो मदद बेमानी है। कुल मिलाकर मौजूदा हालात चिंताजनक हैं। सूखे की आहट साफ सुनाई दे रही है। मानसून की बेरुखी, नाकाफी होती सरकारी योजनाएं और जल संरक्षण की कमी ने किसानों को दोराहे पर खड़ा कर दिया है। अगर समय रहते छोटी नदियों, तालाबों के पुनर्जीवन और ठोस सिंचाई विकल्पों पर काम नहीं हुआ तो बुंदेलखंड फिर सूखे की चपेट में आ सकता है।
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