
- विनोद मिश्रा
बांदा। जहां जमीन की छाती फट जाती है, तालाबों की आंखें सूख जाती हैं और बादलों के इंतजार में पीढ़ियां बीत जाती हैं उस बुंदेलखंड के दर्द को आवाज देने के लिए अतर्रा में एक राज्य स्तरीय कार्यशाला की गई। विद्या धाम समिति के बैनर तले जुटी इस कार्यशाला में सिर्फ भाषण नहीं हुए,बल्कि सूखे की आग में झुलसते बुंदेलखंड के हर गांव, हर खेत और हर प्यासे कंठ की पीड़ा को महसूस किया गया।
प्रख्यात पत्रकार भारत डोगरा ने कहा कि यहां सूखा सिर्फ मौसम की मार नहीं है, यह एक सामाजिक त्रासदी है जो हर साल किसान का सपना, मां की थाली और बच्चे का भविष्य छीन ले जाती है। वरिष्ठ चिंतक अरविंद मूर्ति ने याद दिलाया कि कभी जल-जंगल-जमीन से समृद्ध यह धरती आज बूंद-बूंद को तरस रही है। उच्च न्यायालय के अधिवक्ता संतोष ने चेताया कि अगर अब भी नहीं चेते तो अगली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी।
सामाजिक कार्यकर्ता ब्रजभूषण यादव, विजय बहादुर प्रधान और संघर्षशील साथी मतादयाल ने जोर दिया कि सरकारी फाइलों से निकलकर समाधान अब जमीन पर दिखना चाहिए। विद्याधाम समिति के सचिव राजा भइया का सारगर्भित कथन नें कार्यक्रम का ‘निचोड़’ पेश किया। कहा कि जलवायु परिवर्तन की मार सबसे पहले बुंदेलखंड जैसे इलाकों पर ही पड़ती है। यहां की सूखी नदियां, उजड़े खेत और पलायन को मजबूर परिवार किसी आंकड़े से बड़े हैं यह इंसानी हादसे हैं।
वक्ताओं ने एक सुर में कहा कि अब सिर्फ बैठकें नहीं, बांध टूटने से पहले बंधान चाहिए। तालाब, मेड़बंदी, पारंपरिक जल स्रोतों का जीर्णोद्धार और हर बूंद को सहेजने की जिद चाहिए। कार्यक्रम के अंत में सभी की आंखों में एक ही संकल्प था बुंदेलखंड को उसकी प्यास से आजाद कराना है। प्रतिभागियों ने हाथ उठाकर वादा किया कि वे जल, जंगल और जमीन को बचाने की लड़ाई गांव-गांव तक ले जाएंगे। क्योंकि सूखा अगर नियति नहीं,तो समाधान भी सामूहिक जिम्मेदारी है।
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