
- विनोद मिश्रा
बांदा। कहावत पुरानी है पर बांदा प्रशासन का स्टाइल एकदम नया। ‘आग लगने पर कुआं खोदने’ की सरकारी स्कीम लॉन्च” हो गई है। शहर में बिना पंजीकरण, बिना फायर एनओसी, बिना कई निकास द्वार के चल रहे कोचिंग सेंटरों पर “साहब लोगों की नजर-ए-इनायत” तब पड़ी जब चारों तरफ से “फजीहत की आंच” आने लगी।
फिर क्या था। अपर जिलाधिकारी, बीडीए सचिव, डीआईओएस और सीएफओ का काफिला कैमरा लेकर निकल पड़ा। निरीक्षण में मैथमैटिक्स बाई अंकित गुप्ता, फिजिक्स बाई इ०आदित्य, मैथमैटिक्स बाई आदित्य, इंग्लिश बाई जी०डी० एवं बायलॉजी बाई अनिल द्ववेदी के सेंटर ‘नंगे’ मिले। न रजिस्ट्रेशन का कागज, न आग बुझाने का जुगाड़, न बच्चों के भागने का रास्ता। मतलब आग लगे तो ‘ऑल द बेस्ट’ बोलकर संचालक निकल लें।
प्रशासन ने तुरंत ‘ऐतिहासिक’ एक्शन लिया। एक कोचिंग को सील मारा, बाकी को ‘तत्काल बंद करो’ की चिट्ठी पकड़ा दी। बिजली खेड़ा की लाइब्रेरी को भी धमकाया कि सुधरो या शटर गिराओ। अब जरा सोचिए। “यह कोचिंगें आज नहीं उगीं”। महीनों से बच्चे पढ़ रहे थे, फीस जा रही थी, संचालक कमा रहे थे। तब अफसरों का ‘कुआं’ सूखा था या ‘नजराने’ से भरा था। रजिस्ट्रेशन चेक करना, फायर सेफ्टी देखना, निकास गिनना, यह काम हादसे से पहले होता है। पर यहां तो हादसे की सुगबुगाहट पर ही बाल्टी लेकर दौड़ने की परंपरा है।
असल में ‘आग लगने पर कुआं खोदने’ का मतलब है कि सिस्टम तभी जागता है जब मीडिया जागे या ऊपर से फोन आए। बाकी दिन शटर के पीछे क्या जल रहा है, किसी को मतलब नहीं। एक सेंटर सील करके फोटो सेशन हो गया, खबर बन गई, फाइल बंद। डीएम साहब, कुआं पहले खुदवा लीजिए। क्योंकि जब कोचिंग में सचमुच आग लगेगी तो ये सील और चेतावनी किसी मां के आंसू नहीं पोंछ पाएगी। बांदा को ‘छापेमारी का ड्रामा’ नहीं, ‘रोजाना की निगरानी’ चाहिए। वरना कहावत सच होती रहेगी और बच्चे जोखिम में जलते रहेंगे।
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