
- स्पेशल स्टोरी – शरद मिश्रा
डिजिटल डेस्क, मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में अगर किसी नेता को वर्किंग पावरहाउस कहा जाए, तो नाम सबसे पहले अजित पवार का आता है। चाचा शरद पवार की राजनीतिक पाठशाला में पले-बढ़े अजित पवार ने न सिर्फ सियासत का ककहरा सीखा, बल्कि समय के साथ अपनी एक अलग, असरदार और निर्णायक पहचान भी गढ़ी थी। महाराष्ट्र की राजनीति में जिस शख्स ने दशकों तक सत्ता के गलियारों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, जो हर सरकार में प्रासंगिक बना रहा और जिसे विरोधी भी नजरअंदाज नहीं कर सके, उस अजित पवार का अचानक निधन केवल एक नेता का जाना नहीं है, बल्कि एक पूरे राजनीतिक युग का अचानक थम जाना है। बारामती के पास विमान की लैंडिंग के दौरान हुए हादसे में अजित पवार की मौत की खबर जैसे ही सामने आई, महाराष्ट्र की राजनीति में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सहयोगी हों या विरोधी-हर किसी के लिए यह खबर अविश्वसनीय थी।

अजित पवार केवल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता नहीं थे, बल्कि वे शरद पवार की राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी माने जाते थे। ऐसे समय में जब शरद पवार जीवन के अंतिम पड़ाव में हैं और सुप्रिया सुले राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत कर रही थीं, अजित पवार का यूं चले जाना कई सवाल खड़े कर गया है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस खाली जगह को भरने के लिए वर्षों से राजनीतिक जमीन तैयार हो रही थी, अब उसे कौन और कैसे भरेगा?

अजित पवार की राजनीति शरद पवार की उंगली पकड़कर शुरू जरूर हुई, लेकिन वह कभी सिर्फ ‘भतीजे’ की राजनीति तक सीमित नहीं रही। शरद पवार की सबसे बड़ी ताकत उनकी संगठनात्मक समझ, सत्ता संतुलन और सभी दलों से संवाद बनाए रखने की कला रही। यही राजनीतिक डीएनए अजित पवार में भी दिखता है। शरद पवार की विरासत को संभालने के लिए अगर कोई सबसे उपयुक्त साबित हुआ, तो वह अजित पवार ही थे। उन्होंने सिर्फ भाषणों या विचारधारा के स्तर पर नहीं, बल्कि जमीन पर संगठन खड़ा कर यह साबित किया। खासकर पश्चिमी महाराष्ट्र में सहकारी संस्थाओं पर उनकी पकड़ ने उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया, जिसे नजरअंदाज करना किसी के लिए संभव नहीं था।

अजित पवार को महाराष्ट्र की राजनीति का ‘अजातशत्रु’ कहा जाता रहा है। यह उपाधि यूं ही नहीं मिली। कांग्रेस हो, शिवसेना हो, भाजपा हो या फिर राज ठाकरे की एमएनएस- लगभग हर दल के बड़े नेताओं से उनके व्यक्तिगत रिश्ते सहज रहे। राजनीतिक मतभेद कभी रिश्तों में कड़वाहट में नहीं बदले। यही वजह रही कि चाहे सरकार किसी की भी हो, अजित पवार का राजनीतिक जादू चलता रहा। सत्ता में हों या विपक्ष में, उनकी स्वीकार्यता बनी रही। यह गुण उन्होंने सीधे तौर पर शरद पवार से सीखा था, जिन्होंने दशकों पहले यह समझ लिया था कि राजनीति में दरवाजे कभी पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिए।
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